हाल में लड़कियों के किसी प्रदर्शन में हँसते हुए लगाया गया एक नारा सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया— “एक कचौड़ी, दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा!”नारे में न दर्शन है, न समाजशास्त्र। यह सड़क की भाषा है। इसमें तुक है, व्यंग्य है, अतिशयोक्ति है और शायद गुस्सा भी।लेकिन इस छोटे-से नारे पर जिस तरह कुछ पुरुषों की भावनाएँ आहत हुईं, वह अपने आप में अध्ययन का विषय है।
जिन लोगों ने सदियों से स्त्रियों पर चुटकुले सुनाए, पत्नी को मजाक का पात्र बनाया, सास-बहू के रिश्ते को हास्य में बदला, महिला की बुद्धि, शरीर, उम्र, कपड़े, नौकरी, ड्राइविंग और खरीदारी तक को मनोरंजन का विषय बनाया, उनके लिए यह सब “मजाक” था।
लेकिन स्त्री ने दो मिनट के लिए पुरुष को पंचलाइन बना दिया तो अचानक मर्यादा खतरे में पड़ गई।स्त्री पर चुटकुला—ह्यूमर।पुरुष पर चुटकुला—अपमान।स्त्री का मौन—संस्कार।स्त्री का प्रतिरोध—उच्छृंखलता।स्त्री सहती रहे—महान।स्त्री बोल पड़े—समस्या।मुझे लगता है, असली परेशानी उस नारे में नहीं है।असली परेशानी यह है किलड़की अब बोल रही है।और उससे भी बड़ी परेशानी यह है कि वह बोलते समय डरी हुई नहीं है।वह हँस रही है।यही बात पितृसत्ता को सबसे ज्यादा परेशान करती है।
पितृसत्ता आखिर है क्या? पुरुष देर रात घर लौटे—काम था। स्त्री देर रात लौटे—चरित्र पर सवाल।पुरुष अकेला रहे—स्वतंत्र। स्त्री अकेली रहे—संदेह। पुरुष गुस्सा करे—मर्द है। स्त्री गुस्सा करे—जुबान बहुत चलती है। पुरुष महत्वाकांक्षी हो—काबिल। स्त्री महत्वाकांक्षी हो-घर की चिंता नहीं। पुरुष घर का काम करे—आदर्श पति। स्त्री करे—उसका कर्तव्य।
पितृसत्ता का सबसे खतरनाक रूप यही है कि वह असमानता को असमानता की तरह दिखाई ही नहीं देती। वह उसे सामान्य जीवनका नाम दे देती है। और जब कोई स्त्री उस “सामान्य” पर सवाल उठाती है तो व्यवस्था को लगता है कि वह घर तोड़ रही है।
नई नहीं है स्त्री जागरण की कहानी
भारत में स्त्री के जागरण की कहानी बहुत पुरानी है। 1848 में सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों के लिए स्कूल शुरू किया। उस समय किसी लड़की को पढ़ाना केवल शिक्षा का काम नहीं था, यह सामाजिक व्यवस्था को चुनौती थी। सावित्रीबाई जब स्कूल जाती थीं तो उन पर कीचड़ और गोबर तक फेंका जाता था। लेकिन वे जाती रहीं।कल्पना कीजिए,जिस समाज में लड़की का पढ़ना विद्रोह हो, वहाँ एक महिला रोज किताब लेकर सड़क पर निकल रही है।वह दृश्य आज हमें सामान्य लगता है।लेकिन सामान्य बनने से पहले वह विद्रोह था।
1974 का चिपको आंदोलन इस बात का दूसरा उदाहरण है कि स्त्री का प्रतिरोध केवल स्त्री प्रश्न तक सीमित नहीं होता।उत्तराखंड के रैणी गाँव में गौरा देवी और गाँव की महिलाओं ने जंगल काटने आए लोगों के सामने पेड़ों को अपने शरीर से ढक लिया।वे पेड़ों से लिपट गईं।क्यों?क्योंकि उनके लिए जंगल कोई सरकारी फाइल में दर्ज “वन-संपदा” नहीं था।जंगल उनके जीवन का हिस्सा था।
वह ईंधन था। चारा था। पानी का स्रोत था। भोजन था। जीवन था।इसलिए जब महिलाओं ने पेड़ों को गले लगाया तो वे सिर्फ जंगल नहीं बचा रही थीं। वे यह कह रही थीं किजिस फैसले का असर हमारे जीवन पर पड़ता है, उसमें हमारी आवाज भी होगी। यही स्त्री-चेतना का असली अर्थ है। वह केवल घर के भीतर बराबरी नहीं मांगती।वह पूछती है कि फैसला कौन करेगा?
1972 के मथुरा मामले ने भारत में बलात्कार कानून और न्याय व्यवस्था को लेकर व्यापक महिला आंदोलन को जन्म दिया।मथुरा एक आदिवासी किशोरी थी। पुलिस हिरासत में उसके साथ बलात्कार का मामला सामने आया। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद देश के कई प्रमुख कानूनविदों और महिला संगठनों ने न्याय व्यवस्था में स्त्री के प्रति दृष्टिकोण पर गंभीर सवाल उठाए।
उसके बाद बलात्कार कानून में बदलाव की मांग तेज हुई। फिर 1997 में विशाखा का फैसला आया।कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को पहली बार स्पष्ट रूप से महिलाओं के मौलिक अधिकारों से जोड़ा गया।और अंततः 2013 में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संबंधित कानून अस्तित्व में आया।यह यात्रा हमें एक महत्वपूर्ण बात बताती है—कानून हमेशा संसद से पैदा नहीं होता।
कई बार कानून की पहली पंक्ति किसी ऐसी स्त्री के दर्द से निकलती है, जिसकी आवाज समाज सुनना नहीं चाहता।पहले वह व्यक्तिगत घटना होती है।फिर सवाल बनती है।फिर आंदोलन। फिर सार्वजनिक बहस। और अंततः कानून। निर्भया के बाद सवाल बदल गया। 2012 की दिल्ली की भयावह घटना के बाद देशभर में जो अभूतपूर्व जनाक्रोश सामने आया, उसने यौन हिंसा को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया। लेकिन उस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण परिवर्तन केवल कानून में नहीं था।परिवार की भाषा बदलने लगी।
पहले बेटी से कहा जाता था— “रात में बाहर मत निकलना।” धीरे-धीरे बेटियों ने पूछा— “क्यों?” फिर सवाल आया— “सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल लड़की की क्यों?” यह छोटा-सा बदलाव नहीं है। यह सदियों पुरानी सामाजिक मानसिकता पर हमला है।क्योंकि पितृसत्ता अपराधी से ज्यादा पीड़ित को नियंत्रित करती है। लड़की कहाँ जाएगी? किससे मिलेगी? क्या पहनेगी? कब लौटेगी? किससे बात करेगी?किससे प्रेम करेगी? किससे शादी करेगी? कब शादी करेगी? बच्चा कब पैदा करेगी? इन सवालों की पूरी सूची दरअसल एक ही सवाल की अलग-अलग शक्लें हैं— “तुम्हारे जीवन का मालिक कौन है?” नई लड़की का जवाब है— मैं। पितृ सत्ता को सबसे ज्यादा डर उस स्त्री से लगता है जो उसकी अनुमति के बिना अपना जीवन जीने लगती है।
सत्ता की परिभाषा बदली
स्त्री जागरण की कहानी केवल शहरों की कहानी नहीं है। भारतीय लोकतंत्र में इसका सबसे बड़ा प्रयोग शायद पंचायतों में हुआ।73वें संविधान संशोधन ने पंचायतों में महिलाओं के लिए कम-से-कम एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित किया। बाद में कई राज्यों ने इसे 50 प्रतिशत तक बढ़ाया। आज लाखों महिलाएँ पंचायतों में निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। हजारों महिलाएँ उस व्यवस्था को पार करके स्वयं निर्णय लेने वाली नेतृत्वकर्ता बनी हैं।
पहली बार ग्रामसभा में बोलना। पहली बार अधिकारी के सामने बैठना।पहली बार बजट समझना।पहली बार सरकारी कार्यालय में सवाल पूछना। पहली बार गाँव के पुरुषों से कहना— “यह निर्णय ग्रामसभा करेगी।” यह सब छोटे दृश्य लग सकते हैं।लेकिन लोकतंत्र छोटे दृश्यों से ही बनता है।
पितृसत्ता के ढहने की खबर क्या है?
यह नहीं कि लड़कियाँ प्रदर्शन कर रही हैं। यह भी नहीं कि वे नारे लगा रही हैं।सबसे बड़ी खबर यह है कि लड़कियाँ अब अपने अनुभवों को निजी शर्म नहीं मानतीं। यही असली बदलाव है। जिस घटना को पहले लड़की छिपाती थी, वह अब बताती है। जिस अन्याय को पहले वह “घर की बात” समझती थी, अब सार्वजनिक प्रश्न बनाती है।
इसलिए कुछ लोगों को स्त्री की हँसी भी खतरनाक लगती है स्त्री का रोना पितृसत्ता सह सकती है। उसका रोना उसे स्वीकार्य है। रोती हुई स्त्री को बचाया जा सकता है। लेकिन हँसती हुई, सवाल करती हुई, अपने फैसले खुद लेती हुई स्त्री? वह कठिन है। वह बराबरी मांग रही है। इसलिए जब लड़कियाँ सड़क पर हँसते हुए नारा लगाती हैं तो हमें नारे से ज्यादा उस हँसी को समझना चाहिए। वह हँसी कई बार भय से मुक्ति की हँसी होती है।
पुरुष की मुक्ति भी इसी रास्ते से
पितृसत्ता स्त्री को कैद करती है, लेकिन पुरुष को भी एक भूमिका में कैद करती है। मर्द रो नहीं सकता।मर्द कमजोर नहीं हो सकता। मर्द असफल नहीं हो सकता। मर्द को हमेशा कमाना है।मर्द को हमेशा मजबूत दिखना है। मर्द को हर विवाद में अंतिम शब्द बोलना है। मर्द को अपने परिवार का “मालिक” होना है। इसलिए पितृसत्ता का अंत पुरुष का नुकसान नहीं है।यह पुरुष को भी एक बोझ से मुक्त करता है।
उसे रोने की आजादी मिलती है। उसे असफल होने की अनुमति मिलती है। उसे घर में साझेदार बनने का अवसर मिलता है। उसे पत्नी के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयात्रा करने का अवसर मिलता है। उसे अपनी बेटी की स्वतंत्रता से डरने के बजाय उसकी उड़ान पर गर्व करने का मौका मिलता है। इसलिए स्त्री की मुक्ति अंततःमनुष्य की मुक्ति है। लैंगिक समानता संस्कृति-विरोध नहीं है। और पितृसत्ता का विरोध पुरुषों से नफरत नहीं है। विवेक यह भी सिखाता है कि किसी आंदोलन के एक नारे से पूरे आंदोलन को खारिज नहीं किया जा सकता। जैसे किसी धार्मिक व्यक्ति के अपराध से पूरा धर्म अपराधी नहीं हो जाता, वैसे ही किसी महिला की अतिशयोक्ति से स्त्री-अधिकारों का पूरा प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता।
दीवारें ढह रही हैं
पितृसत्ता का दीवारें बहुत पुरानी है। उसमें धर्म की ईंटें हैं। परंपरा का गारा है। परिवार की प्रतिष्ठा का पलस्तर है। मर्दानगी के लोहे के सरिये हैं।कानून की पुरानी व्याख्याओं की परतें हैं। लेकिन अब उसमें दरारें हैं। और आज की लड़की उस दीवार को लगातार ठेल रही है। लोक सभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी जब युवाओं से ‘स्मैश द पैट्रीआर्की’ का आह्वान कर रहे थे तो वे एक नई राजनीतिक चेतना जगा रहा थे।
इसलिए जब अगली बार कोई लड़की नारा लगाए— “एक कचौड़ी, दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा” तो पहले नारे की भाषा सुधारने मत बैठिए। पहले अपने भीतर देखिए। क्या सचमुच आपकी गरिमा पर हमला हुआ है? या उस अतिरिक्त जगह पर, जिसे आपने अपनी जन्मजात संपत्ति समझ लिया था?क्या आपको स्त्री की आवाज से परेशानी है? वह केवल यह कहती है कि जिस जमीन पर आप अकेले खड़े थे, उस पर अब कोई और भी खड़ा होगा। साथ खड़ा होगा। बराबर खड़ा होगा। बीच में कोई दीवार नहीं होगी। कोई मालिक नहीं होगा। कोई आश्रित नहीं होगा। सिर्फ दो मनुष्य होंगे। बराबर। स्वतंत्र। और शायद उसी दिन हमें समझ आएगा कि पितृसत्ता का टूटना पुरुष की हार नहीं था। वह मनुष्य होने की जीत थी।और शायद वहीं से विवेक की वापसी भी शुरू होगी।