पुण्य तिथि ३० अगस्त पर विशेष बहुआयामी सारस्वत व्यक्तित्व के धनी थे डाॅ विष्णु किशोर झा ‘बेचन’। बिहार के साहित्यिक,सांस्कृतिक एवं शैक्षिक ज..
दशकों से झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में एक बड़ा सवाल है—क्या शहरी निकाय आदिवासी क्षेत्रों पर लागू होंगे? झारखंड हाई कोर्ट ने हाल में ऐसे ही मामले में संकेत दिया कि यह नीति निर्..
दीमा हसाओ का उदाहरण झारखंड के लिए सबक है। पिछले दिनों गुवाहाटी उच्च न्यायालय उस समय स्तब्ध रह गया जब यह सामने आया कि असम सरकार और दीमा हसाओ स्वायत्तशासी जिला परिषद (एनसीएचएसी) ने कोलकाता की महाबल सीमे..
दुनिया की सबसे अमीर ज़मीनों पर बसे लोग गरीब क्यों हैं? तो लीजिए, असल आंकड़े — 30% सोना — माली, बुर्किना फासो, घाना, तंज़ानिया —सोना न..
A Day of Colour, Rhythm—and Forgetfulness
हर वर्ष 9 अगस्त को जब विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है, तो मंच सजते हैं, आदिवासी गीतों की धुनें बजती हैं, रंग-बिरंगे परिधानों में पारंपरिक नृत्य होते हैं, और भाषणों की झड़ी लग जाती है। यह दिन प्रत..
झारखंड के गांवों में हाल के वर्षों में लोकतंत्र की एक नई और जीवंत तस्वीर उभरी है, जिसमें परंपरागत ग्रामसभा और संवैधानिक पंचायत दोनों ने साझा नेतृत्व का एक अनोखा मॉडल प्रस्तुत किया है। यहां गांव की परं..
अल्फ्रेड उरांव कहते हैं,अध्यक्ष महोदय! छोटानागपुर के जो बाशिंदे हैं उनका जंगल से संबंध है और वे जानते हैं कि जंगल ही हमारे जीवन-मरण का सवाल है। वे यह भी जानते हैं कि जंगल का रहना जरूरी है। छोटानाग..
I. प्रस्तावना आदिवासी महिलाओं, विशेष रूप से विवाहित महिलाओं . के कृषि भूमि पर उत्तराधिकार संबंधी अधिकार लंबे समय से रूढ़िगत मान्यताओं और पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण के कारण विवादित रहे हैं।..
रमेश शरण केवल एक अर्थशास्त्री, शिक्षक, कार्यकर्ता और सुधारक भर नहीं थे; उनकी शख्सियत बहुआयामी थी। उनके व्यक्तित्व में बुद्धिमत्ता, संवेदनशीलता, साहस, ऊर्जा और दूरदृष्टि का दुर्लभ समन्वय था। वे विचारक,..
भारतीय संविधान के निर्माण के समय जब भारत अपने भविष्य की नींव रख रहा था, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी और कितनी विकेंद्रित होंगी। संविधान सभा में बाबा साहेब अंबेडकर न..
झारखंड हाई कोर्ट की फटकार के बाद भी राजनीतिक कारणों से झारखंड में पेसा नियमावली लागू नहीं हो पा रही है। राज्यपाल मुख्यमंत्री से आग्रह करते हैं कि पेसा नियमावली लागू कर दी जाए। महाराष्ट्र में भी यह..
हूल दिवस 30 जून पर विशेष साम परगना उलझन में पड़ गया था। "हम समझते हैं कि सरकार आजकल पल्टिन साहब को चाह नहीं रही है। दारोगा को ही..
राजमहल के पहाड़ियों को यदि पता होता कि सिराजुद्दौला और उसके साथियों की लड़खाड़ती और थकी चाल को संभालने से उनकी आने वाली पीढ़ी की आज़ादी बहाल रहती तो संभव था कि उनका व्यवहार कुछ और होता। सत्रहवीं सदी के मध्..
डिजिटल युग में पारदर्शिता, भागीदारी और जवाबदेही की जो अपेक्षाएँ उभरी हैं, वे तकनीक के सहारे ही पूरी हो सकती हैं। लेकिन तकनीक अगर लोक जीवन से असंगत हो, तो वह एक बिचौलिए की भूमिका में आ जाती है जो दूरी ..
"विकास" के नाम पर जब दुनिया आगे बढ़ती है, तो पीछे छूट जाते हैं वे लोग, जो अपने जंगलों, नदियों और पहाड़ों के साथ जीते आए हैं। झारखंड के आदिवासी ऐसे ही समुदाय हैं, जो अब एक नई वैश्विक अवधारणा ..
नौ जून को बिरसा सवेरे नौ बजे मर गया, लेकिन शाम को साढ़े-पाँच बजे के पहले सुपरिटेंडेंट मुआयना न कर सके। मुआयना करके लिखा : 'पाकस्थली जगह-जगह सिकुड़कर ऐंठ गयी है। क्षीण होते-होते छोटीं आँतें बहुत पत..
जब महात्मा गांधी ने "ग्राम स्वराज" की बात की थी, तो उनका सपना केवल प्रशासन के विकेंद्रीकरण तक सीमित नहीं था। वे एक ऐसी ग्राम-व्यवस्था की परिकल्पना कर रहे थे, जहाँ सत्ता, संस्कृति और समाज की ..
“जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी” — यह नारा आज भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में उभर चुका है। वर्षों से पिछड़े, दलित और आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों क..
झारखंड के किसी भी आदिवासी गाँव में चले जाइए — चाहे वह खूंटी के डोंबारी बुरू की तलहटी हो, या पश्चिमी सिंहभूम के सुदूर जंगलों में बसा सारंडा का कोई गाँव। आप पायेंगे कि जीवन का मिज़ाज कुछ और ही है।..
सुख्यात साहित्यकार तारा शंकर बंधोपध्याय के उपन्यास हँसली बांक की उपकथा – में एक प्रसंग आता है- बनवारी ने एक और लड़ाई देखी है।सन 1914 से शुरू हुई थी। कुछ ही साल तक चली थी-खूब याद है उसे। धोती जोड़े..
भारतीय समाज की संरचना अत्यंत जटिल और बहुपरत है। इसमें वर्चस्व की प्रवृत्तियाँ केवल सत्ता और अर्थव्यवस्था के ज़रिए नहीं, बल्कि गहरी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से आकार लेती रही हैं। यह वर्चस..
के टी शाह की पुण्य तिथि 14 मार्च पर विशेष जब देश की आजादी के अग्र पंक्ति के ज्यादातर नेता वेस्टर्न कलर में रंग गये थे और भारत के विकास की बुनियाद के लि..
पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्यों के लिए बेहद महत्वपूर्ण कानून है। यह संविधान के पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों को ..
पेसा के चिंतन-मनन के सत्र में आज प्रस्तुत है,छठी अनुसूची के पैटर्न पर विमर्शपेसा-1996 की धारा 4(ओ) छठी अनुसूची के पैटर्न के अनुपालन का क्या संदर्भ है कई साथियों की मान्..
पेसा पर चल रहे चिंतन-मनन पर सार्थक बहस के लिए ये विचार प्रस्तुत किए जा रहे हैं। हम थोड़ा ओल्ड स्कूल के हैं, इसलिए सबकुछ को असंवैधानिक और गैर कानूनी नहीं समझ पाते हैं। तीन किश्तों की पहली श्र..
सुधीर पाल क्या ड्राफ्ट पेसा नियमावली समुदायों की रुढ़ि, परंपरा और रीति-रिवाज से असंगत है? क्या सम..
संविधान के 73वें संशोधन के बाद पंचायतों में महिलाओं को कम से कम एक तिहाई आरक्षण की व्यव..
सुधीर पाल/ छंदोंश्री
पहला सवाल यही हो सकता है कि स्थल निरीक्षण के दौरान स्थल निरीक्षण की सूचना ग्राम वन अधिकार समिति ने फॉरेस्ट और राजस्व विभाग को दी तीन स्थितियों समानता देखी गई है पहले की फॉरेस्ट और राजस्व के लोग नहीं आ..
इसमें कोई संदेह नहीं है कि हाल में समाप्त हुए झारखंड के विधानसभा चुनावों के जो भी परि..
दिल्ली एयरपोर्ट की वह संयोगभरी शाम! संभवतः 2008 का मार्च महीना रहा होगा। दिल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा उस दौर में आज जैसा विशाल और चमचमाता नहीं था। न वह सजी-धजी दु..
'अथातो कबीर जिज्ञासा' प्रो नृपेन्द्र वर्मा द्वारा रचित समय—समय पर लिखे गए उनके अभिनव मौलिक चिंतन पर आधारित शोधपूर्ण आलेखों का नवीनतम संग्रह है। जिसका प्रकाशन शिव शक्ति योगपीठ, नवगछिया, ..
खट्टी-मीठी इमली की गोलियाँ हमेशा से मेरी कमज़ोरी रही हैं। याद है बचपन में, जब हल्के पीले पारदर्शी कागज़ में लिपटी छोटी-सी गोल इमली मिलती थी, तो बस दिल खुश हो जाता था। दही-बड़े पर भी अगर किसी चीज़ ने ह..
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार इस बात को लेकर मोर्चा खोले हुए है कि जब संविधान राष्ट्रपति और राज्यपाल को निर्णय लेने की समय-सीमा में नहीं बांधे हुए है तो कोर्ट क्यों निर्णय ले। सुप्रीम कोर्ट ने रा..
पलासी की लड़ाई ने अंग्रेजों को पाँव जमाने की ताकत दी, तो 1764 के बक्सर युद्ध की जीत ने उन्हें जमीन पर मालिकाना अधिकार दिए। यह भारतीय अवाम को गुलाम बनाने की पहली संगठित मुहिम थी। इससे पहले जितनी भी लड़ाई..
21वीं सदी के इस शोर-गुल में जहां पूरी दुनिया तकनीक, मुनाफा और विकास की रफ्तार पर सवार है—वहीं पृथ्वी की सांसें धड़कनों से तेज़ हांफ रही हैं। वायुमंडल गर्म हो रहा है, नदियाँ सूख रही हैं, पेड़..
1855 में जब सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, और फुलो-झानो ने ‘दामिन-ए-कोह’ की धरती पर अंग्रेज़ी राज, महाजनों और जमींदारों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका, तो वह सिर्फ हथियारबंद विद्रोह नहीं था, व..
'शैतान ही जानता है, चुनाव के लिए कैसी-कैसी चालें चली जाती हैं, कैसे-कैसे दाँव खेले जाते हैं। अपने प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने के लिए बुरे से बुरे साधन काम में लाये जाते हैं। जिस दल के..
छत्तीसगढ़ के बस्तर और सरगुजा से लेकर झारखंड, उड़ीसा और महाराष्ट्र सहित अन्य राज्यों तक फैले आदिवासी समाज में उत्तराधिकार का अधिकार अब तक पुरुषों तक सीमित रहा है। ‘हमारी बहन बेटियां हमारी अमानत ह..
जिन गाँवों को संविधान की पाँचवीं अनुसूची और पेसा कानून ने ‘स्वशासी’ माना है, आज वहीं से खबरें आ रही हैं — ‘गाँव में घुसने पर रोक लगा दी गई…’ &l..
पत्रकारिता अब सिर्फ अखबारों के पन्नों और टीवी चैनलों की स्क्रिप्ट में सीमित नहीं है। जहाँ मुख्यधारा मीडिया (प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक) बड़े कॉर्पोरेट घरानों, राजनीतिक गठजोड़ों और शहरी दर्शकों के प्रभ..
हेमंत सोरेन शायद पहले मुख्यमंत्री होंगें जिन्होंने यूरोपीय देशों की यात्रा के बाद झारखंड को यूरोप बनाने की वकालत नहीं की। मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड का मिज़ाज अन्य इलाकों से अलग है। हम खूबियों को जरू..
प्रधान मंत्री से लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को इज ऑफ डूइंग बिजनेस का मुहावरा पसंद है। इज ऑफ डूइंग बिजनेस यानि एक ऐसी दुनिया की कल्पना है जिसमें प्रक्रियाएं तेज़ हों, अनापत्ति प्रमाणपत्र ऑनलाइन मिले..
कतंत्र का मूल तत्व "जन भागीदारी" है। और भागीदारी वहीं संभव होती है जहाँ संवाद सहज, सुलभ और संस्कृति से जुड़ा हो। यदि ग्राम सभा में या ग्राम पंचायत में कोई बात ऐसी भाषा में कही जाए जो ग्र..
पटना का ऐतिहासिक श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल 14 जून 2025 को एक ऐसे ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना, जिसने बिहार के सामाजिक व राजनीतिक परिदृश्य में एक नई इबारत लिख दी। लगभग तीन ..
झारखंड के अनुसूचित जनजाति समुदाय के अंतर्गत कुल 32 छोटी और बड़ी जनजातियाँ आती हैं। हालांकि जनजातीय समुदायों को एकीकृत श्रेणी के रूप में देखा जाता है, परंतु उनके भीतर भी सामाजिक, शैक्षिक और ..
झारखंड की राजनीति इन दिनों एक ऐसे विषय के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिसे अगर ठीक से समझा जाए तो यह न केवल राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रश्न है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक आत्मा के लिए भी एक कसौटी-परीक्..
हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। स्कूलों, संस्थानों, सरकारी कार्यालयों और स्वयंसेवी संगठनों में एक ही वाक्य गूंजता है— "धरती को बचाना है!" लेकिन क्या सचमुच धरती को बच..
जातिगत जनगणना और उसकी संभावित परिणतियाँ आज केवल सामाजिक न्याय की पुनर्परिभाषा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ढाँचे की पुनर्संरचना का संकेत भी हैं। विशेष रूप से अनुसूचित क्षेत्रों और ट्राइबल सब-प्लान (टीएसपी)..
अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (22 मई 2025) के अवसर पर एक विशेष कहानी झारखंड के आदिवासी इ..
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में समय-समय पर संविधान के माध्यम से वंचितों को आवाज़ देने के प्रयास किए गए हैं। देश की स्वतंत्रता के बाद जिस संवैधानिक ढांचे की स्थापना की गई, उसका मूल उद्देश्य यही था कि हर..
अब समय आ गया है जब हम 'ग्राम संसद' की कल्पना को एक व्यवहारिक, संवैधानिक और ठोस आकार दें। ग्राम संसद केवल ग्राम सभा की नई नामावली नहीं है, बल्कि यह एक नई राजनीतिक चेतना का स्वरूप है। इसका आशय उ..
छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act), 1908, झारखंड के आदिवासियों की भूमि सुरक्षा की आत्मा है। यह कानून आदिवासियों को न केवल बाहरी ज़मींदारी शोषण से बचाता है, बल्कि उनके सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को भ..
(इस आलेख पर साथियों के विचार आमंत्रित हैं। विचार पेसा और पंचायत राज पर ही आधारित हो ताकि हम अपनी समझ बढ़ा सकें तो बेहतर रहेगा।) पेसा का पूरा ढांचा पंचाय..
केन्द्रीय पंचायती राज तथा मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल ने नयी दिल्ली में ‘राज्यों में पंचायतों का अंतरण की स्थिति-एक सांकेतिक साक्ष्य आधारित रैंकिंग’ शीर..
पेसा पर चल रहे चिंतन-मनन पर सार्थक बहस के लिए ये विचार प्रस्तुत किए जा रहे हैं। तीन किश्तों की दूसरी शृंखला यहां प्रस्तुत है: पेसा से संबंधित सवाल-जवाब क्य..
झारखंड राज्य के पांचवी अनुसूची क्षेत्र (शिड्यूल एरिया) में उच्च न्यायालय द्वारा राज्य सरकार को पेसा कानून के तहत नियमावली बनाने का निर्णय दिये जाने के बाद पर राज्य सरकार द्वारा पहल करते हुए नियमावली ब..
सुधीर पाल झारखंड में जेपीआरए, 2001 नहीं चलेगा तो क्या चलेगा? देश में झारखंड समेत दस राज्य पाँचव..
मतदाताओं ने की..
ऊन उत्पादन किसी भी राज्य ही नहीं, देश की अर्थव्यवस्था को ऊंचाइयों पर ले जाने का बहुत बड़ा साधन हो सकता है।लेकिन यह दुर्भाग्य है कि भारत में इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। ऊन के लिए भेड़ पालन की..
प्रतिवर्ष 19 नवंबर को विश्वभर में वर्ल्ड टॉयलेट दिवस मनाया जाता है. इस दिवस को मनाने का उद्देश्य लोगों को खुले में शौच करने से रोकना व शौचालय से जुड़े मानवाधिकार को समझान..