21वीं सदी के इस शोर-गुल में जहां पूरी दुनिया तकनीक, मुनाफा और विकास की रफ्तार पर सवार है—वहीं पृथ्वी की सांसें धड़कनों से तेज़ हांफ रही हैं। वायुमंडल गर्म हो रहा है, नदियाँ सूख रही हैं, पेड़ कट रहे हैं, और जानवरों की प्रजातियाँ गुम होती जा रही हैं। जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं—वर्तमान की त्रासदी है। इस विनाश के बीच अगर धरती अब भी जीवित है—तो उसका श्रेय उन लोगों को जाता है जो धरती को माता और जंगल को देवता मानते आए हैं। यही लोग हैं जिन्हें हम 'आदिवासी' कहते हैं—और जिनकी जीवनशैली में ही वह ‘मंत्र’ छिपा है जो आज दुनिया को बचा सकता है।
ठीक आदिवासी दिवस के करीब हजारों आदिवासी हसदेव अरण्य क्षेत्र को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने हसदेव अरण्य क्षेत्र में केंटे विस्तारित कोयला परियोजना को मंजूरी दे दी है। इसके लिए 1742 हेक्टेयर घने वन भूमि को नष्ट करना आवश्यक है। यह मंजूरी सरगुजा जिला वन अधिकारी द्वारा स्थल के तथाकथित निरीक्षण के बाद दी गई है।
यदि यह परियोजना लागू हो जाती है, तो पहले से ही बुरी तरह प्रभावित उन क्षेत्रों में और भी ज़्यादा तबाही मच जाएगी जहाँ खनन कार्य चल रहा है। आधिकारिक निरीक्षण रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम 4.5 लाख पेड़ काटे जाएँगे। ये पेड़ घने जंगल में हैं, जहाँ कार्बन अवशोषण के लिए महत्वपूर्ण देशी पेड़ बहुतायत में हैं। इस क्षेत्र में खुले में खनन से पहले ही हज़ारों पेड़ नष्ट हो चुके हैं, पानी और ज़मीन प्रदूषित हो चुकी है।
इसके अलावा, इन परियोजनाओं को संबंधित ग्राम सभाओं की राय और संविधान व कानूनी ढाँचे के उन प्रावधानों की अनदेखी करके शुरू किया जा रहा है जो ग्राम सभाओं की सहमति को अनिवार्य बनाते हैं। ओपन कास्ट माइनिंग वास्तविक परियोजना से परे एक बहुत बड़े भौगोलिक क्षेत्र को प्रभावित करती है। इसलिए, भले ही इस विशिष्ट क्षेत्र में मानव बस्ती नगण्य हो, लेकिन क्षेत्र के बाहर के कई गाँव इससे बुरी तरह प्रभावित होंगे। स्थानीय समुदायों की ओर से सरकार को 1500 से ज़्यादा लिखित आपत्तियाँ दी गई थीं। लेकिन इन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया।
विडंबना देखिए आप जब इन पंक्तियों को पढ़ रहे होंगें, छत्तीसगढ़ सरकार विश्व आदिवासी दिवस पर एक भव्य और ऐतिहासिक जश्न मना रही है। हजारों आदिवासी अब भी नहीं समझ पा रहे हैं कि यह आदिवासी दिवस आदिवासियों के लिए है या हसदेव के जंगलों को तबाह, बरबाद करने का उत्सव है।
आदिवासी होना क्या है?
‘आदिवासी’ केवल एक जनजातीय समुदाय नहीं है—यह एक जीवनशैली, एक सभ्यता और एक सोच है, जिसमें संरक्षण, सहजीवन और संवेदना के बीज छिपे हैं।
जब हम कहते हैं "आदिवासियत से ही बचेगी दुनिया", तो उसका अर्थ यह नहीं कि दुनिया को आदिवासी बन जाना चाहिए, बल्कि यह कि दुनिया को आदिवासी सोच से जीना सीखना होगा। जहाँ पेड़ काटने से पहले उससे क्षमा मांगी जाती है। जहाँ हर जीव, हर नदी, हर पहाड़ एक रिश्ते के रूप में देखा जाता है। जहाँ ‘पाया नहीं, साझा किया जाता है’—और विकास का अर्थ लूट नहीं, लय होता है।
संख्या में छोटे, मूल्य में बड़े
भारत में लगभग 10.5 करोड़ आदिवासी हैं—कुल जनसंख्या का लगभग 8.6%। ये लोग 700 से अधिक जनजातियों में विभाजित हैं, लेकिन एक चीज़ इन सभी को जोड़ती है—प्रकृति से गहरा रिश्ता। ये वे लोग हैं जिनका कोई कार्बन फुटप्रिंट नहीं, फिर भी जलवायु न्याय की सबसे बड़ी कीमत ये ही चुकाते हैं। ये वो लोग हैं जिन्होंने कभी जंगल पर अधिकार नहीं जताया, लेकिन जंगलों को सबसे अधिक बचाया। इनके जीवन का सबसे बड़ा पाठ है—"हम प्रकृति के मालिक नहीं, उसके साझेदार हैं।"
जश्न नहीं, जिम्मेदारी
हर साल 9 अगस्त को मनाया जाने वाला विश्व आदिवासी दिवस दुनिया भर के उन समुदायों को सम्मानित करता है जिन्होंने संपत्ति नहीं, सहअस्तित्व को चुना। लेकिन यह दिन केवल भाषण और नाच-गाने के लिए नहीं होना चाहिए, बल्कि यह पूछने का दिन है— क्या हमारी विकास नीति आदिवासी जमीन और जल को लीलती जा रही है? क्या खनन, बांध और सड़क परियोजनाएं जंगलों से आदिवासी और उनके विश्वास को बेदखल कर रही हैं? क्या हमने "आदिवासी" को केवल संस्कृति तक सीमित कर दिया है, और उसके राजनीतिक अधिकारों को छीन लिया है?
आज देश की अधिकांश खनिज संपदा, जल संसाधन और वन क्षेत्र उन्हीं इलाकों में स्थित हैं जहाँ आदिवासी निवास करते हैं—छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, नागालैंड, मिज़ोरम, त्रिपुरा, आदि। यह संयोग नहीं, बल्कि इतिहास की विडंबना है कि इन क्षेत्रों में सबसे अधिक खनन परियोजनाएं, बड़े बांध, औद्योगिक कॉरिडोर और सड़कों की परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। इन तथाकथित 'विकास' योजनाओं की कीमत पर न केवल आदिवासी अपनी जमीन और जंगल से बेदखल हो रहे हैं, बल्कि उनके विश्वास, परंपराएं, समाज संरचना और राजनीतिक स्वायत्तता भी नष्ट हो रही है।
1950 से अब तक लगभग 5 करोड़ लोग विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित हुए हैं, जिनमें 40% से अधिक आदिवासी हैं। केवल झारखंड में पिछले दो दशकों में 12 लाख से अधिक लोग अपनी जमीन से बेदखल हुए। 2006 में बने वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत जिन अधिकारों को मान्यता दी गई, उनकी 70% से अधिक दावेदारियाँ अभी तक लंबित हैं या खारिज कर दी गई हैं।
जंगलों के प्रहरी: पर्यावरण की अंतिम उम्मीद
एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की 80% जैवविविधता उन क्षेत्रों में संरक्षित है, जहाँ आदिवासी समुदाय रहते हैं। ये समुदाय अपने पारंपरिक ज्ञान, अनुष्ठानों और सामूहिक निर्णय प्रणाली के माध्यम से: वनस्पतियों की प्रजातियों की रक्षा करते हैं, नदियों और जलस्त्रोतों का संरक्षण करते हैं,और औषधीय ज्ञान को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं।
जब यूरोपीय देश 'क्लाइमेट टेक' और 'ग्रीन एनर्जी' की बात कर रहे हैं, एक आदिवासी महिला अपने गांव के पास छोटे-से कुंआ को स्वच्छ रखकर सौ परिवारों का जल जीवन चला रही होती है।
आदिवासी ज्ञान: विज्ञान से कम नहीं
बहुत लोग आदिवासी ज्ञान को 'अंधविश्वास' समझते हैं, जबकि यह स्थानीय विज्ञान का सर्वोत्तम रूप है। उदाहरण के लिए झारखंड के हो जनजाति में यह परंपरा है कि पेड़ को केवल तब काटा जाए जब उसके पास कम से कम पाँच नए पेड़ रोपे गए हों। उड़ीसा के कोंध आदिवासी हर वर्ष ‘मेरिया पर्व’ मनाते हैं जिसमें वे जंगलों को दान देते हैं, न कि उनसे मांगते हैं। मध्य भारत की बैगा जनजाति, कभी हल नहीं चलाते क्योंकि उनका मानना है कि धरती माँ की छाती को नहीं चीरना चाहिए। ये सब सिर्फ ‘संस्कृति’ नहीं, सतत विकास की वैकल्पिक दृष्टि हैं।
पेसा और वनाधिकार की महत्ता
भारतीय संविधान ने भी आदिवासियत की महत्ता को मान्यता दी है—विशेषकर दो ऐतिहासिक कानूनों के ज़रिए। पेसा 1996, अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा को स्थानीय संसाधनों, खनन, जल-जंगल-जमीन और परंपरागत संस्थाओं पर निर्णय लेने का अधिकार देता है। वनाधिकार कानून 2006, उन समुदायों को जंगलों पर अधिकार देता है जो पीढ़ियों से वहां रह रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन कानूनों का पूरी तरह से कार्यान्वयन नहीं हो पाया, और आदिवासी समुदाय आज भी अपनी जमीन के लिए, अपने जंगल के लिए, अपनी भाषा और संस्कृति के लिए संघर्ष कर रहा है।
क्या दुनिया आदिवासियों से कुछ सीख सकती है?
बिल्कुल। और सीखना अब विकल्प नहीं, आवश्यकता है। आदिवासी हमें सिखाते हैं कि 'कम में भी जीवन संभव है।' वे हमें दिखाते हैं कि 'प्रकृति के साथ लड़ो नहीं, उसके साथ जियो।' वे हमें याद दिलाते हैं कि 'विकास का अर्थ विनाश नहीं है।' अगर आज की शिक्षा व्यवस्था, विकास नीति और राजनीति—आदिवासी सोच को केंद्र में रखकर पुनः गढ़ी जाए, तो हम सिर्फ समाज नहीं, भविष्य को भी बचा सकते हैं।
आदिवासियत—भविष्य का दर्शन
आदिवासियत कोई बीती हुई संस्कृति नहीं, बल्कि आने वाले समय की सबसे प्रासंगिक जीवनशैली है। जब सांस लेने लायक हवा कम पड़ रही है, जब धरती की छाती जल रही है, जब समाज बंट रहा है और संबंध टूट रहे हैं—तब एक आदिवासी विचार ही है जो कहता है: “पृथ्वी को मत जीतो, उससे प्रेम करो।”
"अगर पृथ्वी को बचाना है, तो उसे वही लोग बचाएंगे जिनका जीवन धरती के साथ बंधा हुआ है, न कि उससे अलग।" इसलिए जब हम 9 अगस्त को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ मनाएं, तो केवल तालियाँ न बजाएं, बल्कि अपनी नीतियों, दृष्टिकोण और जीवनशैली में थोड़ी सी आदिवासियत को जगह दें। क्योंकि वाकई... आदिवासियत से ही बचेगी दुनिया।