झारखंड के गांवों में हाल के वर्षों में लोकतंत्र की एक नई और जीवंत तस्वीर उभरी है, जिसमें परंपरागत ग्रामसभा और संवैधानिक पंचायत दोनों ने साझा नेतृत्व का एक अनोखा मॉडल प्रस्तुत किया है। यहां गांव की परंपरागत संस्थाओं के प्रतिनिधि मुंडा, मांझी, महतो, पाहन अब निर्वाचित मुखिया और पंचायत सदस्यों के साथ मिलकर ग्राम समाज का भविष्य तय कर रहे हैं। यह व्यवस्था न केवल परंपरा और विधि का तालमेल है, बल्कि स्थानीय लोकतंत्र को जमीन से जोड़ने वाली ताकत भी है। एक ओर हैं ग्रामसभाएं विधायिका की तरह गांव की नीति और दिशा तय करती हैं; दूसरी ओर पंचायतें कार्यपालिका की तरह योजनाओं का क्रियान्वयन करती हैं। दोनों मिलकर लोकतंत्र का साझा मॉडल बना रहे हैं।
ग्रामसभा और पंचायत: लोकतंत्र की दो धुरी
भारत का संविधान पंचायत राज संस्थाओं को तीसरी सरकार के रूप में मान्यता देता है। अनुच्छेद 243(B) के तहत ग्राम पंचायतों का गठन होता है, वहीं अनुच्छेद 243(A) ग्रामसभा को स्थानीय स्वशासन की इकाई मानता है। ग्रामसभा गांव के उन सभी वयस्क नागरिकों का मंच है जो चुनाव में मतदाता के रूप में पंजीकृत हैं। यह मंच गांव के संसाधनों, पारंपरिक नियमों, सामाजिक विवादों और सामूहिक भलाई से जुड़े मुद्दों पर न केवल चर्चा करता है, बल्कि निर्णय भी लेता है। मुंडा, मांझी, महतो, पाहन जैसे स्थानीय नेता ग्रामसभा की परंपरागत ताकत के प्रतीक हैं और सामाजिक अनुशासन, भूमि विवाद, संस्कृति व त्योहारों से जुड़े विषयों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। ग्रामसभा न केवल योजना स्वीकृत करती है, बल्कि संसाधनों के उपयोग, सामाजिक विवादों के समाधान और ग्राम विकास की दिशा तय करती है।
पंचायतें ग्राम सभा के माध्यम से चुने गए प्रतिनिधियों की संस्थाएं हैं, जिनके अंतर्गत मुखिया, उपमुखिया, वार्ड सदस्य, पंचायत समिति सदस्य होते हैं। ये प्रतिनिधि सरकार की योजनाओं को लागू करते हैं, प्रशासन से संवाद करते हैं और पंचायत निधियों का प्रबंधन करते हैं। पंचायतें सरकार की योजनाओं को लागू करने, निधियों का प्रबंधन करने और प्रशासन से संवाद स्थापित करने का उत्तरदायित्व निभाती हैं। इनकी वैधता संविधान से मिलती है, पर ग्रामसभा की मंजूरी के बिना इस कार्यपालिका की सफलता अधूरी रहती है। झारखंड में 2010, 2015 और 2022 में पंचायत चुनाव हुए हैं। पंचायत चुनाव से पहले गांवों में केवल पारंपरिक व्यवस्था थी। मांझी, महतो, परगनैत, मुंडा ही गांव की निगरानी करते थे। परंतु पंचायत चुनावों के बाद निर्वाचित मुखिया और पारंपरिक ग्राम प्रधानों यथा मुंडा, महतो, मांझी आदि के बीच एक नया समीकरण उभरा।
2010 के चुनाव के समय एक संशय की स्थिति बनी हुई थी। ग्राम सभाओं को लग रह था कि फिर से मुखिया राज का समय लौट रहा है। आदिवासी क्षेत्रों में बाहरी लोग आकार चुनाव लड़ेंगे और शासन करेंगे। ग्रामीणों का भय बेवजह नहीं था। 1978 और उससे पहले हुए चुनाव में 100 फीसदी आदिवासी गांवों में भी बाहर से आए लोग और गैर आदिवासी ही मुखिया और प्रतिनिधि बने थे। कई गांवों में मुंडा-मांझी और मुखिया के बीच अधिकार को लेकर संघर्ष हुआ था। मुखिया को सरकारी योजनाओं और बजट की जिम्मेदारी मिली, लेकिन मांझी को गांव की सांस्कृतिक और सामाजिक स्वीकृति प्राप्त थी। इससे कई बार ग्रामसभा की उपेक्षा हुई। 2010 के बाद पंचायतों के गठन से पारंपरिक मांझी और निर्वाचित मुखिया के बीच अधिकारों को लेकर कई गांवों में टकराव की स्थिति बनी। जहां योजनाओं की आर्थिक-प्रशासनिक जिम्मेदारी मुखिया के पास थी, वहीं सामाजिक स्वीकृति मांझी के पास। इसका नतीजा यह हुआ कि कई बार सामूहिक निर्णय और योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावित हुआ।
समन्वय की ओर बढ़ता गांव
2015 और विशेषकर 2022 के चुनावों के बाद गांवों में एक नया अनुभव उभरा—मांझी और मुखिया की पारस्परिकता के बिना गांव चलता नहीं। खूंटी, पश्चिमी सिंहभूम, गुमला, सिमडेगा जैसे जिलों में अब मुखिया और मांझी मिलकर ग्रामसभा बैठकों की अध्यक्षता करते हैं, योजनाओं का निर्धारण करते हैं, विकास को साझा नेतृत्व की भावना से आगे बढ़ाते हैं। साझा संचालन में जब मुंडा-मांझी सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि प्रदान करते हैं और मुखिया प्रशासनिक दिशा, तो गांव के निर्णय अधिक समावेशी और व्यावहारिक होते हैं — यही झारखंड की कई ग्रामसभाओं में दिखाई देता है। उदाहरण के लिए पश्चिम सिंहभूम के कई गांवों में मुंडा की अनुमति के बिना किसी भी प्रकार की योजना, स्थल का चयन या ज़मीन हस्तांतरण आदि नहीं होता है। ग्राम प्रधानों और पंचयत प्रतिनिधियों के बीच समन्वय बना हुआ है। अच्छी बात यह है कि अनुसूचित क्षेत्र वाले पंचायतों में मुखिया आदिवासी ही हैं।
गुमला जिले के बसिया प्रखंड में एक महिला मुखिया ने ग्राम प्रधान की सलाह पर ही गांव में हैंडपंप की जगह जलमीनार लगाने का निर्णय लिया, क्योंकि ग्राम सभा ने जानकारी दी थी कि गांव में सालों से जलस्तर गिर रहा है। खूंटी की एक ग्रामसभा ने कंपनी को गांव में प्रवेश से रोका क्योंकि उसने ग्रामसभा की अनुमति नहीं ली थी। लोहरदगा के सिरका गांव ग्रामसभा ने निर्णय लिया कि वन क्षेत्र में कोई योजना तभी लगेगी जब पारंपरिक ग्राम सभा और वनाधिकार समिति सहमति देगी। ग्राम पंचायत ने ग्राम सभाओं के निर्णय का सम्मान किया। पाकुड़ के अमरापाडा में ग्राम सभा ने पावर कंपनी को जमीन नहीं देने का निर्णय लिया और ग्राम पंचायत के चुने हुए प्रतिनिधियों ने भी इस निर्णय का स्वागत किया और वी आंदोलन में ग्राम सभाओं के साथ हैं। ऐसे दर्जनों उदाहरण झारखंड में मौजूद हैं जहां ग्राम सभा और पंचायत ने मिलकर व्यापक जन हित के फैसले लिए हैं।
4 अगस्त, 2000 को लोकसभा में 'ग्रामसभा की भागीदारी' विषय पर आयोजित एक विशेष बहस में बिहार के सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह ने जो संकल्प पढ़ा वह अपने आप में ग्रामसभा की स्वायत्तता का पुख्ता प्रमाण है। उन्होंने संसद में कहा कि जैसे राज्यों में विधानमंडल है और सरकार है, केन्द्र में पार्लियामेंट है और केबिनेट है, उसी तरह से वहां ग्रामसभा और पंचायतें हैं। मतलब यहां देश के पैमाने पर जो पार्लियामेंट का स्थान है, उसी तरह से राज्य-स्तर पर विधानसभा का और ग्राम-स्तर पर ग्रामसभा का स्थान है।
अनुसूचित क्षेत्र में पारंपरिक स्वशासी संस्थाओं के साथ पंचायत व्यवस्था का कमोबेश संतुलन बना हुआ है। ग्राम सभाओं की बैठकों की अध्यक्षता ग्राम प्रधान करते हैं तथा गांव में उत्पन्न विवादों में ग्राम सभाएं अपनी भूमिका निभाती हैं। निर्वाचित संस्थाओं यथा- ग्राम पंचायत, पंचायत समिति की भूमिका सरकारी योजनाओं को लागू करने मात्र तक है।
निर्वाचित प्रतिनिधियों यथा- मुखिया के तौर पर ज्यादातर जगहों पर युवा ही चुनकर आये हैं। पढ़े-लिखे और विकास योजनाओं से वास्ता पड़ने की वजह से उनकी विकास को लेकर समझ ग्राम प्रधानों से भिन्न है। पंचायत-प्रतिनिधियों को पता है कि गांव की जरूरतें और गांवों के विकास के लिये विकास के नये घटक और आयाम के साथ चलना जरूरी है। सरकारी संसाधनों का ज्यादा से ज्यादा दोहन तथा सरकारी संस्थाओं के साथ संबंध और समन्वय बनाने में वे परम्परागत प्रधानों की तुलना में ज्यादा सक्रिय हैं।
झींकपानी के कोन्दुआ पंचायत के दोकट्टा गांव के डाकुआ पवन दास कहते हैं कि परम्परागत ग्रामसभा और पंचायत-प्रतिनिधियों में तालमेल हो गया है। दोनों की भूमिका स्पष्ट है। पुराने ढंग से तो हम गांव को नहीं चला सकते हैं। विकास के अर्थ और आयाम बदल गये हैं। एक स्वयंसेवी संस्था ने अध्ययन में पाया कि अध्ययन क्षेत्र में पारम्परिक नेताओं में से 56 फीसदी, निर्वाचित प्रतिनिधियों में से 74 फीसदी और आदिवासी उत्तरदाताओं में से 64 फीसदी कहते है कि पंचायत प्रणाली और बेहतर साबित हो रही है।
साझा मॉडल: दोनों व्यवस्थाओं की शक्तियों का मेल
पुनर्स्थापना की दृष्टि से जरूरी है कि इन दोनों व्यवस्थाओं को विरोधी नहीं, पूरक के रूप में देखा जाए। नेतृत्व का साझा मॉडल निम्नलिखित सिद्धांतों पर आधारित हो सकता है। निर्णय वही मान्य हों जो ग्रामसभा में पारित हों। ग्रामसभा में पारंपरिक और निर्वाचित दोनों नेतृत्व की सहभागिता अनिवार्य हो।
पंचायत में ‘ग्राम संचालन मंच’ या ‘ग्राम नेतृत्व समन्वय समिति’ बनाई जाए, जिसमें मुखिया, उपमुखिया, वार्ड सदस्य और मांझी, परगनैत, पाहन सभी शामिल हों। यह समिति पंचायत की बैठकों की तैयारी, ग्रामसभा की रूपरेखा, और योजनाओं के सामाजिक दृष्टिकोण पर कार्य करेगी।
मांझी-परगनैत स्थानीय परंपरा और सामाजिक अनुशासन की दृष्टि से सलाह दें। मुखिया-वार्ड सदस्य विकास योजनाओं और प्रशासनिक संवाद की दृष्टि से भूमिका निभाएं। दोनों मिलकर प्रस्ताव तैयार करें और उसे ग्रामसभा में प्रस्तुत करें। पंचायत के कानूनी कार्य जैसे योजना पास करना, बजट खर्च करना — निर्वाचित प्रतिनिधि देखें। सामाजिक-सांस्कृतिक और पर्यावरणीय पहलुओं की निगरानी — पारंपरिक नेतृत्व करे। ग्रामसभा की बैठकों की अध्यक्षता वैकल्पिक रूप से मांझी और मुखिया करें।
क्यों जरूरी है यह मॉडल?
झारखंड का लोकतांत्रिक बल उसकी परंपरा में छुपा है। ग्रामसभा और पंचायत अगर सहयोग से काम करें तो यह सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक न्याय और स्थानीय स्वशासन की संपूर्णता है। यह व्यवस्था गांव की आत्मनिर्भरता, न्याय और समावेशन की भी गारंटी बनती है। झारखंड के अनुभवों से स्पष्ट है कि एक के बिना दूसरा अधूरा है।
ग्रामसभा और पंचायत — दोनों लोकतंत्र की दो आंखें हैं; मांझी और मुखिया, गांव के दो मजबूत कंधे। साझा नेतृत्व का झारखंडी मॉडल देश के सभी अनुसूचित क्षेत्रों के लिए आदर्श दिशा बन सकता है और ‘ग्राम स्वराज’ को वास्तविकता के धरातल पर उतार सकता है। जब पारंपरिक दृष्टि और संवैधानिक जिम्मेदारी एक मंच पर आती है, तभी पंचायत जन-जन का तंत्र बनती है।