पलासी की लड़ाई ने अंग्रेजों को पाँव जमाने की ताकत दी, तो 1764 के बक्सर युद्ध की जीत ने उन्हें जमीन पर मालिकाना अधिकार दिए। यह भारतीय अवाम को गुलाम बनाने की पहली संगठित मुहिम थी। इससे पहले जितनी भी लड़ाईयां हुई, राजाओं में समझौते हुए थे, उसमें सत्ता बदली थी, जमीन पर अवाम की सेहत पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा था। यह पहला मौका था जब सारी मार-काट बेकार गई। हज़ारों हिंदू-मुसलमान खेत रहे और नवाब इलाहाबाद आकर अंग्रेजों से सुलह कर लोगों की जमीन की सौदा कर आए। उसके बाद 182 साल तक अंग्रेजों से लड़ते रहे, भिड़ते रहे। आजादी के बाद भी यक्ष प्रश्न खड़ा है, जमीन किसकी?
ईस्ट इंडिया कंपनी के संचालकों ने क्लाइव को दूसरी बार भारत भेजा, बंगाल का गवर्नर और प्रधान सेनापति बनाकर। 9 अगस्त 1765 को क्लाइव इलाहाबाद में बादशाह शाह आलम से मिला। कमजोर और नाममात्र के बादशाह ने एक फरमान जारी कर बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी कंपनी को सौंप दी। बादशाह शाह आलम का कंपनी को दीवानी देने का 12 अगस्त 1765 का फरमान भी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
‘........अंग्रेजी कंपनी को उनकी सेवाओं तथा मित्रता के प्रत्युतर में हमने बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी दे दी है...यह आदेश है कि कंपनी २६ लाख रूपए सालाना, जो राशि नवाब नजमुद्दोल्ला बहादुर ने तय की है, की देनदार होगी और यह धन सरकारी खजाने में प्रतिवर्ष जमा करेगी। इस सन्दर्भ में, क्योंकि उन्हें बंगाल इत्यादि की सुरक्षा के लिए एक बड़ी सेना रखनी पड़ेगी, हमने इजाज़त दे दी है कि 26 लाख रूपए सरकारी खजाने में जमा करने के बाद और निज़ामत का खर्चा उठाने के बाद, लगान इत्यादि की सारी आमदनी वह अपने पास रख सकती है. .... उनके किसी काम में दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए. ... इन आदेशों के पालन में कोई भूल –चूक नहीं होनी चाहिए। ’
गुलामी का फ़रमान
यह बादशाह का फरमान क्या था, क्लाइव की जबदरस्ती थी। मजबूर शाह आलम ने बस दस्तखत किये थे। इतिहासकार सैयद गुलाम खान ने इस पर लिखा-जितनी देर एक गधे को बेचने में लगती है, उससे भी कम समय में इतना अहम फैसला हो गया।
यह नए युग के सरकारी सेवाओं के आउटसोर्सिंग के चलन के समान नहीं था। रूपए वसूलने के लिए खुद की सेना रखने की भी आज़ादी थी ताकि कंपनी को राजस्व वसूलने में बाधा नहीं हो।
बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी तो कंपनी के हाथ लग गयी लेकिन कंपनी की क्षमता और दक्षता जमीन जैसे जटिल विषय को संभालने की नहीं थी। अंग्रेज़ विद्वान और राजनेता चार्ल्स जेन्किंसों की टिप्पणी थी- ‘जिंसों की खरीद-बिक्री में कंपनी की प्रबंधकीय-प्रशासनिक क्षमता है। दीवानी जैसे मामले को संभालना ईस्ट इंडिया कंपनी की क्षमता से बाहर की चीज है। हिन्दुस्तान में जमीन बेहद जटिल विषय है।’
कंपनी के पास भूमि स्वामित्व, भू-राजस्व, भू-प्रकृति और इससे जुड़े गाँव-समाज के संबंधों को समझने की सलाहियत नहीं थी। कंपनी में दक्ष प्रशासकों की कमी थी। कंपनी के बढ़ते खर्च का दवाब था। कंपनी की एकमात्र कोशिश थी जल्द-से-जल्द लगान की वसूली हो। कंपनी के तत्कालीन अधिकारियों में ज्यादातर ऐसे थे जिन्हें ना तो इंग्लैंड और ना ही हिन्दुस्तान की जमीन और जमीन से जुड़े सामजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों का इल्म था। जमीन आधारित ढांचों का भी अनुभव नहीं था। हिंदुस्तान के विविध सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने और उससे जुड़ीं जमीन की जटिलता को समझने के लिए लिखित दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे।
मुग़ल शासन काल में जागीर एक अत्यंत उलझा हुआ मसला था. जागीरदार और राजा, जागीरदार और प्रजा, राजा और प्रजा तीनों के सम्बन्ध बहुस्तरीय और एक-दुसरे से उलझे हुए थे। इन जागीरों के अभिलेख, इनकी सूचना, इनकी वास्तविक भूमि, राजस्व आदि का पूरा विवरण रखना प्रशासनिक रूप से असंभव था। भूमि का स्वमित्व, भूमि की जुताई, बुआई के अधिकार, भूमि से राजस्व प्राप्त करने की प्रणालियाँ आदि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे जटिल पक्ष है। ये अलग-अलग क्षेत्रों में, राज्यों में,शासकों के युग में अलग-अलग रूप में पायी जाती है।संथालों और दूसरे आदिवासी समुदायों ने हमेशा से माना-‘हम किसी की प्रजा नहीं हैं। अजगरों को काटकर हमने जमीन हासिल की है। कोई हमारे जैसा नहीं है। हमने खेत बनाये, हमने गाँव बसाये। मुग़ल-अमले, नवाब-सूबेदार, किसी ने कर-लगान नहीं माँगा। बल्कि परगनादार, चकलेदार दुर्गा पूजा में सम्मान ही देते रहे हैं। ’
जमीन किसका?
अंग्रेजों के समक्ष सबसे यक्ष प्रश्न था- जमीन किसका? जमीन का मालिक कौन? मनु(9/44) के अनुसार जमीन उसकी है जो सबसे पहले उसे तोड़े; जैसे हिरण उसका होता है जो सबसे पहले तीर मारता है। पतंजलि ने ह्ल्य भूमि (जोतने लायक खेत) में निजी स्वामित्व का उल्लेख किया है। झारखण्ड के टाना भगतों (आदिवासी समूह) की मान्यता है-‘जमीन भगवान की, हम भगवान के बच्चे, भगवान द्वारा दी गयी जमीन पर हम गुजारा करते हैं, इसलिए जमीन और हमारे बीच राजा-महाराजा –सरकार कहाँ से आ गयी। ’
कौटिल्य शक्तिशाली सम्राट तंत्र के समर्थक हैं और उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में राज्य के कार्यकलाप पर हावी होने के लिए सम्राट को प्रोत्साहित किया है। दीघनिकाय में कहा गया है कि राजा निखेत निधि ( धरती में गाड़कर जमा किया हुआ धन) और खनिज के आधे अंश का स्वत्वधारी होता है, क्योंकि वह भूमि का रक्षक और स्वामी होता है।
किसान ही जमीन के स्वामी थे। अनेक संहिताओं में लिखा गया है कि जमीन का असली स्वामी राजा था। फिर भी एक बार जोतने के लिए जमीन तैयार कर लेने के बाद यह मिल्कियत किसान के हाथ में चली जाती थी। राजा के आधिराज्य और किसान के स्वामित्व के बीच कोई विवाद नहीं था। युद्ध क्षेत्र में हुए फैसलों के अनुसार राजा और राजत्व में परिवर्तन होता रहा लेकिन किसानों की मिल्कियत कभी प्रभावित नहीं हुई. सिर्फ कर किसी दूसरे की तिजोरी में जाने लगता।
कंपनी के आने के पहले तक जमीन को जोतने वाला जमीन का मालिक भी था। जमीन की मिल्कियत पर राजाओं और उनके जागीरदारियों का कोई दावा नहीं था। उन्हें वही मिलता था जो उनका वाजिब हक बनता था। इंग्लैंड में जमीन व्यक्ति की निजी सम्पति होती होती थी। उसे वह खरीद सकता था,बेच सकता था, गिरवी रख सकता था। किसान या काश्तकार उसके बंधुवा मजदूर की तरह होते थे। हिन्दुस्तान में जमीन की बिल्कुल भिन्न व्यवस्था थी।
परम्परा में जमीन सहित सभी प्राकृतिक संसाधन लोगों के लिए उनकी जिंदगी चलाने के साधन माने जाते थे, सम्पति नहीं। कोई व्यक्ति किसी भी भूमि के केवल उत्पादन का ही लाभ उठा सकता था। अन्य वस्तुओं की तरह जमीन को ना तो बेचा जा सकता था और ना ही खरीदा जा सकता था।
झारखण्ड के मुंडारी- खूंटकट्टी व्यवस्था वाले गाँव भी अलग-अलग जगहों में बसे थे। खूंट की बुनियाद पर ही मुंडा गाँव का अस्तित्व है।खूंट के आधार पर बसे गाँव की भूमि-व्यवस्था को खूंटकट्टी कहा जाता है।खूंट के आधार पर बसे गाँव को खूंटकट्टी गाँव. खूंटकट्टी गाँव किसी एक खूंट के सदस्यों का होता है। और उस गाँव की समूची भूमि एवं जंगल तथा प्राकृतिक स्रोतों पर उस गाँव में बसे खूंट के सभी सदस्यों का सामूहिक स्वामित्व होता है।
260 सालों बाद भी बादशाह शाह आलम का कंपनी को दीवानी देने का 12 अगस्त 1765 का फरमान आज भी अलग-अलग नामों और रंगों में जिंदा है। कंपनियां बदली, आजादी मिली, सरकारें बदली, सरकारें बिगड़ी, कानून बने, नियम बदले, लेकिन अवाम आज भी जमीन पर लड़ रही है। अंतर इतना है, कल गोरों से अवाम लड़ रही थी और आज अपनी ही चुनी सरकारों से लड़ रही है।