पुस्तक समीक्षा: कबीर के विचारों को सामयिक संदर्भ में पेश करता 'अथातो कबीर जिज्ञासा' 

कुमार कृष्णन



'अ​थातो कबीर जिज्ञासा' प्रो नृपेन्द्र वर्मा द्वारा रचित समय—समय पर लिखे गए उनके अभिनव मौलिक चिंतन पर आधारित शोधपूर्ण आलेखों का नवीनतम संग्रह है। जिसका प्रकाशन शिव शक्ति योगपीठ, नवगछिया, भागलपुर के पीठाधीश्वर परमहंस आगमानंद जी महाराज के सौजन्य से मानस प्रकाशन, पटना के द्वारा जनकल्याणार्थ एवं समस्त भारतीय समाज की मंगलकारी योजनाओं के अंतर्गत किया गया है। कबीर पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। हिंदी के कई ख्यातिलब्ध मर्मज्ञ विद्वान मनीषियों  की पुस्तकें प्रकाशित हैं। कबीर साहित्य के समृद्व भंडार ​को देखते हुए मुझे भी महसूस होता है कि अब कबीर पर कुछ भी लिखा जाना विचारों की पुनरावृति ही कही जाएगी। परन्तु डा वर्मा के इस चिंतनवाली पुस्तक के आद्योपांत अघ्ययन से मेरा भ्रम दूर हुआ और मैंने अनुभव किया कि कबीर के क्रंतिदर्शी जीवन के चिंतन मनन के और भी कई रूप हैं जिसे परत दर परत उघार कर जनमानस के बीच लाने की आवश्यकता है, जिससे भारतीय समाज की मनोदशा बदला जा सके। आजादी के बाद भारतीय समाज में राजनीतिक कारणों से विकृतियां बढ़ी हैं। फलस्वरूप च्यक्ति विकेंद्रीकरण वाली सोच घटी है। जाति,धर्म के घृणित भाव छूत— अछूत से हमारी सनातनी सामजिक च्यवस्था पर जरूरत के मुताबिक प्रहार करने से चूकता नहीं है। संकीर्णता को बढ़ाबा मिला है। लोग अपने — अपने हिसाब से संतों विचारकों और दार्शनिकों के मतों का विवेचन कर जनमानस के बीच गलत धारणाओं की ​परिव्यप्ति कर रहें है। मध्यकालीन कवियों में कबीर पर यह प्रहार कुछ अधिक जान  पड़ता है। कबीर समाज सापेक्ष होने के साथ—साथ समाजकेंद्रित क्रांतिदर्शी संत कवि थे। वहुआयामी चिंतन के संत कवि थे। वे किसी जाति, धर्म और सम्प्रदाय के बीच विरोध को हवा देनेवाले नहीं बल्कि लोगों को इन संकीर्णताआं से अलग रहकर समानता की राह पर ले चलनेवाले मानवतावादी संत कवि थे और इसके लिए पाखंड,ब्रहाांडम्बरों, अंधपंरपराओं और विश्वासों पर प्रहार करना जरूरी भी था। इसी पुस्तक की भूमिका में परमहंस आगमानंद जी महराज ने स्पष्ट तौर पर इस पुस्तक के लिखे जाने के पक्ष में बेबाक ढंग से कहा है— 'सभी आलेखों में संत कबीर के जनमानस में जो भ्रामक मानसिकता और  संकीर्णता की भावना व्याप्त है, आशा है उस कुहेसिका को दूर करने में तथा भविष्यद्ष्टा को कबीर को समझने  के लिए उपयोगी पुस्तक है।

जहां तक इस पुस्तक के शीर्षक का सवाल है, यह अपने आप में रहस्यमूलक है और उपनिषद की तरह 'अथातो ब्रहृमजिज्ञासा' का वोधक है। पुस्तक की अंतर्वस्तु की झांकी इस शीर्षक में निहीत प्रतीत होती है। इस पुस्तक के संदर्भ में मेरा यह मानना है कि कबीर के विचारों को सामयिक संदर्भ में प्रकाशित करनेवाली यह महत्वपूर्ण एवं प्रमाणिक पुस्तक है जिसे विद्वान पाठकों के साथ कबीर के अनुयायियों को भी पढ़ने की जरूरत है। इस पुस्तक के प्रथम आलेख ' आदि शंकराचार्य और कबीर' में लेखक ने इन दोनो मनीषियों के सम्बन्ध में प्रचलित मान्यताओं और भ्रम को अपने अभिनव तर्क और प्रमाणों के जरिए तोड़ने का प्रयास किया गया है। मेरे ख्याल से आदि शंकराचार्य और कबीर पर हिंदी में शायद यह पहला आलोचनात्मक प्रयास है, जो आज की सामाजिक और जातीय समानता की मर्यादा की रक्षा करने में पथ प्रदर्शक हो सकता है लेखक इस अभिनव और मौलिक चिंतन राष्ट्रीय एकता और सद्भावना के लिए महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। इसके पूर्व डा वर्मा ने मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत का अध्ययन इसी आलोचनात्मक दृष्टि से करते हुए जायसी को सामाजिक, जातीय और धार्मिक सद्भाव का सिद्ध कवि सिद्ध किया है। इनकी अब तक की प्रकाशित पुस्तकों में 'पद्मावत का लोकतात्विक अध्ययन, 'आधुनिक हिंदी गद्य साहित्य ', 'आधुनिक हिंदी कविता संवेदना का स्वर वैविध्य ', 'प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और प्रयोग, 'समय के चाक पर भारत तथा 'चलो गांव की ओर ' कविता संग्रह महत्वपूर्ण है।

समीक्षित कृति: अ​थातो कबीर जिज्ञासा 
मानस प्रकाशन,पटना
सहयोग - 200/ रुपये

 

 

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