दिल्ली एयरपोर्ट की वह संयोगभरी शाम!
संभवतः 2008 का मार्च महीना रहा होगा। दिल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा उस दौर में आज जैसा विशाल और चमचमाता नहीं था। न वह सजी-धजी दुकानों की कतारें थीं, न हर कोने में चमकती एलईडी स्क्रीनें। तब एयरपोर्ट की पहचान लंबी कतारों, शोरगुल और यात्रियों की बेचैनी से होती थी।
मुझे जर्मनी के लिए उड़ान पकड़नी थी। इमिग्रेशन की औपचारिकताएँ पूरी कर मैं लाबी में आ बैठा। चारों तरफ़ स्टील पर प्लास्टिक लिपटी नीली-सी कुर्सियाँ, जिन पर यात्री आधे लेटे, आधे जागते-झपकते इंतज़ार कर रहे थे। अचानक मेरी नज़र एक चेहरे पर पड़ी—चिर-परिचित, किताबों और पत्रिकाओं के पन्नों से उतरकर सामने खड़ा।
वे राजेन्द्र यादव थे। ‘सारा आकाश’ के लेखक, लेकिन उससे कहीं बढ़कर हिंदी साहित्य में एक आंदोलन खड़ा कर देने वाले ‘हंस’ के संपादक।
मैंने हिम्मत जुटाई, आगे बढ़कर अभिवादन किया। उन्होंने मुस्कराकर मेरा परिचय सुना और सहजता से बातचीत में उतर आए। बोले—
“कहाँ जा रहे हैं?”
“जर्मनी।”
“अच्छा! मैं भी बाहर जा रहा हूँ। एक सेमिनार में बुलाया गया है, बोलना है।” मुझे अच्छी तरह याद नहीं है लेकिन संभवतः किसी खाड़ी देश की बात उन्होंने की थी। शयाद कुवैत.... कत्तर....।
बातों का सिलसिला शुरू हुआ। मैंने ‘हंस’ के संपादकीयों की तारीफ़ की। वे ठहाका मारकर बोले—
“जानते हैं, इन सेमिनारों में क्यों जाता हूँ? ताकि ‘हंस’ के लिए पैसे जुटा सकूँ। पत्रिका चलाना मज़ाक नहीं है। ये यात्राएँ उसी के लिए हैं।”
उस क्षण मुझे अहसास हुआ कि ‘हंस’ सिर्फ कागज़ पर छपती पत्रिका नहीं है, बल्कि एक जीवन-यज्ञ है, जिसमें राजेन्द्र यादव अपने अस्तित्व तक को आहुति देते थे।
‘हंस’ के संपादकीय की ताक़त
‘हंस’ मूलतः प्रेमचंद द्वारा 1930 में शुरू की गई पत्रिका थी। बाद में बंद हो गई। लेकिन 1986 में जब राजेन्द्र यादव ने इसका पुनर्प्रकाशन किया, तब उन्होंने सिर्फ पत्रिका नहीं निकाली, एक आंदोलन खड़ा किया। ‘हंस’ के संपादकीय हिंदी समाज के लिए वैसा ही थे जैसे संसद में विपक्ष की आवाज़। सीधे, तीखे, असहज करने वाले।
कुछ उदाहरण—
• स्त्री की स्वतंत्रता पर उन्होंने लिखा—“हमारी सभ्यता ने स्त्री को सिर्फ देह और गृह के दायरे में बाँध दिया है। साहित्य का दायित्व है कि वह इन जंजीरों को तोड़े।”
• दलित विमर्श पर उन्होंने कहा—“हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में दलित अनुभव का अभाव है। जब तक यह शामिल नहीं होगा, हमारी भाषा अधूरी रहेगी।”
• राजनीति और समाज पर उन्होंने बार-बार सवाल उठाए—जातिवाद, सांप्रदायिकता और सत्ता के दुरुपयोग पर।
हर संपादकीय जैसे किसी ज़िंदा ज़ख्म पर नमक छिड़कने जैसा था। लोग तिलमिला उठते थे, आलोचना होती थी, लेकिन वही तिलमिलाहट समाज को सोचने पर मजबूर करती थी।
स्त्री विमर्श और दलित विमर्श : उनकी भूमिका
राजेन्द्र यादव की सबसे बड़ी देन यह रही कि उन्होंने हिंदी साहित्य को स्त्री विमर्श और दलित विमर्श की नई जमीन दी। उनके लिए स्त्री कोई “काव्य की नायिका” नहीं थी, बल्कि एक जीवित, संघर्षरत मनुष्य थी। उन्होंने स्त्रियों के लेखन को ‘हंस’ में स्थान दिया—और दर्जनों लेखिकाओं को मंच दिया। उनका मानना था कि “स्त्री सिर्फ पुरुष की परछाईं नहीं है, वह अपने सवालों और आकांक्षाओं के साथ खड़ी है।”
हिंदी साहित्य में दलित अनुभवों को जगह देने का साहस भी उन्होंने किया। ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, शरणकुमार लिंबाले जैसे लेखकों की रचनाएँ ‘हंस’ में छपीं।
उनका कहना था— “जब तक दलित अनुभव नहीं आएंगे, साहित्य समाज का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएगा।” यह साहस उस दौर में बहुत बड़ा था, क्योंकि साहित्यिक समाज अक्सर इन सवालों से कतराता था।
आलोचना, विवाद और विरासत
राजेन्द्र यादव विवादों से अछूते नहीं रहे। कुछ लोग उन्हें “विवादप्रिय” कहते थे। कई बार उन पर आरोप लगा कि वे साहित्य को सिर्फ राजनीति बना रहे हैं। स्त्री विमर्श में उनकी भूमिका को लेकर भी मतभेद रहे—कुछ ने कहा कि वे स्त्रियों के मुद्दों को आगे बढ़ाते हैं, तो कुछ ने उन पर पुरुषवादी दृष्टिकोण से खेलने का आरोप लगाया।
लेकिन यह तय है कि उन्होंने साहित्य को आरामदेह कोना नहीं रहने दिया। उनकी मौजूदगी बहस, असहमति और संवाद को जन्म देती थी। उनका सबसे बड़ा योगदान यही था कि उन्होंने ‘हंस’ को जीवंत मंच बनाए रखा। मुझे याद है, उन्होंने कहा था.. मैं हंस का संपादक, प्रबंधक, मार्केटिंग मैनेजर सब कुछ हूँ....।
*मेरी आँखों का दृश्य
जब एयरपोर्ट पर हमारी उड़ानों का ऐलान हुआ, हम दोनों उठ खड़े हुए। उन्होंने जाते-जाते मुस्कराकर कहा—
“लिखते रहिए, यही सबसे बड़ी पूँजी है।” वह दृश्य आज भी मेरी आँखों में ताज़ा है। उस भीड़-भाड़, उस अधबने एयरपोर्ट की हलचल में एक लेखक अपने काम, अपनी पत्रिका और अपने विचारों के लिए जी-जान लगाते हुए दिखा। आज जब ‘हंस’ की विरासत पर नज़र डालता हूँ, तो लगता है कि वह आधा घंटा किसी किताब का सबसे मार्मिक पन्ना था। छोटा, लेकिन स्थायी।
राजेन्द्र यादव सिर्फ लेखक नहीं थे, वे संवाद और संघर्ष की परंपरा थे। उन्होंने हमें सिखाया कि—साहित्य को सवाल उठाने चाहिए, वर्जनाओं को चुनौती देनी चाहिए, और हर दौर में हाशिए की आवाज़ को मंच देना चाहिए।
दिल्ली एयरपोर्ट पर हुई मेरी पहली और अंतिम मुलाकात आज भी मेरे लिए प्रेरणा है। जैसे उन्होंने कहा था—
“लिखते रहिए, यही सबसे बड़ी पूँजी है।”