दशकों से झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में एक बड़ा सवाल है—क्या शहरी निकाय आदिवासी क्षेत्रों पर लागू होंगे? झारखंड हाई कोर्ट ने हाल में ऐसे ही मामले में संकेत दिया कि यह नीति निर्माण का विषय है और संसद को ही तय करना है। संविधान का अनुच्छेद 243-ZC भी यह कहता है कि शहरी स्थानीय निकाय (नगरपालिकाएँ) अनुसूचित क्षेत्रों पर स्वतः लागू नहीं होंगी, जब तक संसद इनके लिए विशेष प्रावधान न करे। यह सब इसलिए किया गया ताकि आदिवासी क्षेत्रों की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान और उनके लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित रहें।
रॉबर्ट प्रभात मिंज द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका में अनुसूचित क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण और रांची नगर निगम के अस्तित्व को चुनौती दी थी। झारखंड उच्च न्यायालय ने अपर्याप्त दलीलों और साक्ष्यों के कारण याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया और पाया कि इसमें कोई दम नहीं है। रॉबर्ट प्रभात मिंज बनाम झारखंड राज्य के मामले में झारखंड हाई कोर्ट ने 26 जुलाई, 2025 को यह फैसला सुनाया।
रॉबर्ट प्रभात मिंज बनाम झारखंड राज्य का फैसला यह बताता है कि संवैधानिक सुरक्षा और न्यायिक प्रक्रिया दोनों ही तभी कारगर हैं, जब याचिकाकर्ता ठोस साक्ष्य और मजबूत दलीलें प्रस्तुत करे। रिट याचिका में तथ्यों की मज़बूती ज़रूरी है। अनुच्छेद 226 के तहत दाख़िल याचिका में सामान्य आरोप मान्य नहीं है और प्रत्येक तथ्य को साक्ष्य से जोड़ना होगा।
न्यायालय का दृष्टांत: स्वतः लागू नहीं होगा ‘मेसा’
कोर्ट ने कहा कि रांची नगर निगम को विघटित करने का आदेश देने के लिए परमादेश की प्रकृति में रिट जारी करना उचित नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने सुंदरगढ़ ज़िला आदिवासी अधिवक्ता संघ और अन्य बनाम ओडिशा राज्य सरकार और अन्य के मामले में सुंदरगढ़ जिले को उड़ीसा नगर पालिका अधिनियम,1950 की परिधि से बाहर रखने संबंधी याचिका रद्द कर दी।
सर्वोच्च न्यायालय ने बोंदू रामास्वामी बनाम बैंगलोर विकास प्राधिकरण मामले में कहा था कि उद्देश्य शहरी स्थानीय निकायों को मज़बूत करना था, लेकिन यह अनुसूचित क्षेत्रों में स्वतः लागू नहीं होता। संविधान (चौहत्तरवाँ संशोधन) अधिनियम, 1992, जिसमें भाग IX-A को संविधान में शामिल किया गया है, शहरी क्षेत्रों में नगरपालिकाओं की व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास करता है। इन स्थानीय स्वशासन को सुदृढ़ और प्रभावी आधार पर स्थापित करके और चुनावों के नियमित और निष्पक्ष संचालन के लिए उपाय प्रदान करता है। उक्त भाग IX-A को शामिल करने से पहले भी देश भर में नगरपालिकाएँ मौजूद थीं, लेकिन इन स्थानीय स्वशासनों के प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए मजबूत आधार का अभाव था।
नगरपालिकाओं की संरचना, वार्ड समितियों का गठन और संरचना, कमजोर वर्गों के लिए सीटों का आरक्षण, नगरपालिकाओं की अवधि, शक्तियाँ, अधिकार, नगरपालिकाओं की ज़िम्मेदारियाँ, कर लगाने की शक्ति, नगरपालिकाओं के चुनावों का उचित अधीक्षण और केंद्रीकृत नियंत्रण, जिला नियोजन और महानगरीय नियोजन के लिए समितियों का गठन, नगरपालिकाओं से संबंधित राज्य कानूनों में या तो मौजूद नहीं थे या अपर्याप्त या दोषपूर्ण पाए गए थे।
मध्यप्रदेश के जबलपुर उच्च न्यायालय ने 2009 में अनुसूचित क्षेर्तों में शहरी स्थानीय इकाइयों के चुनाव पर रोक लगा दी थी तथा केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह इस दिशा में एक कानून बनाए। बाद में उसे अपने निर्णय को रद्द करना पड़ा, क्योंकि न्यायालय का मानना था कि केंद्रीय कानून के अभाव में चुनाव प्रकिया तो चलती रहनी चाहिए।
‘मेसा’ की संवैधानिक स्थिति
संविधान का भाग IX-A नगरपालिकाओं से संबंधित है। लेकिन अनुच्छेद 243-ZC(1) साफ कहता है कि अनुसूचित क्षेत्रों में यह प्रावधान लागू नहीं होंगे। केवल संसद ही कानून बनाकर इन प्रावधानों को अनुसूचित क्षेत्रों तक बढ़ा सकती है। यानी अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासन और स्थानीय संस्थाओं का ढांचा अलग और विशेष है।
इसका सीधा संबंध यह है कि नगरपालिकाएँ या नगर निगम सीधे इन क्षेत्रों पर अधिकार नहीं जमा सकते जब तक संसद उन्हें विशेष रूप से वहाँ लागू न करे। अनुच्छेद 243-ZC के आधार पर रांची नगर निगम को भंग करने की याचिका भी अस्वीकार की गई क्योंकि संसद ने अभी तक ऐसा कोई विशेष संशोधन नहीं किया है। अंततः याचिका को निराधार मानकर खारिज कर दिया गया।
21 अगस्त, 2025 को सांसद राजकुमार रोत के सवाल के जवाब में जनजातीय कार्य मंत्री दुर्गा दास उड़के ने आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के हवाले से स्पष्ट किया कि नगरपालिकाओं के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) विधेयक, 2001 (मेसा) 30 जुलाई 2001 को राज्यसभा में पेश किया गया था।
विधेयक को शहरी और ग्रामीण विकास संबंधी संसदीय समिति (तेरहवीं लोकसभा) को भेजा गया, जिसने अक्टूबर, 2003 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। स्थायी समिति की सिफारिशों के आधार पर, मेसा विधेयक, 2001 के प्रावधानों में संशोधन के लिए मंत्रिमंडल की का निर्णय लिया गया। हालाँकि, मसौदा कैबिनेट नोट आगे नहीं किया जा सका।
राज्यपाल हस्तक्षेप कर सकते हैं
21 अगस्त, 2025 को संसद में दिए गए बयान स्पष्ट हो गए है कि राज्यपाल चाहें तो झारखंड नगरपालिका अधिनियम, 2011 में हस्तक्षेप कर सकते हैं। अनुच्छेद 244 के अंतर्गत पाँचवीं अनुसूची के पैरा 5(1) में यह प्रावधान है कि "इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, राज्यपाल लोक अधिसूचना द्वारा निर्देश दे सकेंगे कि संसद या किसी अन्य राज्य का कोई विशेष अधिनियम राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कोई भी निर्देश राज्य के अनुसूचित क्षेत्र या उसके किसी भाग पर लागू नहीं होगा अथवा राज्य के अनुसूचित क्षेत्र या उसके किसी भाग पर ऐसे अपवादों और संशोधनों के अधीन लागू होगा जैसा कि वह अधिसूचना में निर्दिष्ट कर सकता है और इस उप-अनुच्छेद के तहत दिया गया कोई भी निर्देश पूर्वव्यापी प्रभाव से दिया जा सकता है।
जनजातीय कार्य मंत्री दुर्गा दास उड़के संसद में अतारांकित प्रश्न के जवाब में कहा है कि इन प्रावधानों के आधार पर, संबंधित राज्य के राज्यपाल के अनुमोदन से सार्वजनिक अधिसूचना के माध्यम से अनुसूचित क्षेत्रों में नगरपालिकाओं का गठन किया जा सकता है।
लापरवाही नहीं षड्यंत्र है ‘मेसा’ का लागू नहीं
अनुसूचित क्षेत्र में ‘मेसा’ का लागू नहीं होना महज़ लापरवाही नहीं है। यह आदिवासी स्वायत्त स्वशासन को संवैधानिक मान्यता नहीं देने का षड्यंत्र है। आर्थिक उदारीकरण के बाद शहरीकरण को विकास का इंजन मान लिया गया। देश के सकल घरेलू उत्पाद में गांव की तुलना में शहर के ज्यादा योगदान ने इसे नीतिगत तौर पर महत्वपूर्ण बना दिया। सकल घरेलू उत्पाद में 63 प्रतिशत हिस्सेदारी शहरों की है। बड़े कारखाने और फ़ैक्टरियों का विकास शहरों तथा महानगरों में ही हुआ। 11वीं पंचवर्षीय योजना में भारत के आर्थिक विकास के लिये शहरीकरण को लक्ष्य बनाया गया था।
नेशनल कमीशन ऑन पॉपुलेशन (एनसीपी) का अनुमान है कि 2036 तक 38.6 फीसदी भारतीय, शहरी इलाकों में रहेंगे यानी तब 60 करोड़ लोगों का बसेरा इनमें हो जाएगा। विडम्बना है कि शहरीकरण के विकास के साथ-साथ स्लम भी फैलता जा रहा है। शहरी आबादी का लगभग 17.4% स्लम में रहता है। दरअसल शहरी क्षेत्र में विकास का मतलब आधारभूत संरचनाओं का विकास है। सड़क, ब्रिज, मॉल, बड़ी-बड़ी इमारतें, कल-कारखाने आदि शहरी क्षेत्र के विकास के संकेतक हैं। विकास के इस मॉडल में ज्यादा से ज्यादा जमीन का अधिग्रहण होता है और बस्ती के बस्ती उजड़ जाता है।
अनुसूचित क्षेत्रों में टेनेंसी कानून में सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए जमीन के अधिग्रहण का प्रावधान है. ग्रामीण इलाकों में ‘पेसा’ और ग्राम सभाओं की वजह से लोगों के पास प्रतिरोध के क़ानूनी और संवैधानिक अधिकार हैं। ‘मेसा’ में मोहल्ले में होने वाले विकास की रूपरेखा को स्वीकार या खारिज करने का अधिकार मोहल्ला सभा के पास है। जमीन अधिग्रहण के पूर्व मोहल्ला सभा की सहमति आवश्यक है। सरकार के लिए कॉर्पोरेट के हितों की अनदेखी कर ‘मेसा’ को क़ानूनी शक्ल देना बेहद मुश्किल है।
झारखंड सरकार की रुचि नहीं
संसद में जानकारी दी गयी कि 4 फरवरी 2020 को आवास एवं शहरी कार्य मंत्री के अनुमोदन से, स्थायी समिति द्वारा अनुशंसित विधेयक को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया। मंत्रिमंडल की मंजूरी लेने से पहले हितधारक परामर्श शुरू करने का भी निर्णय लिया गया। तदनुसार, मेसा विधेयक पर स्थायी समिति द्वारा सिफारिशों पर 10 राज्यों अर्थात आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और तेलंगाना से टिप्पणियां मांगी गई। अब तक आठ राज्यों से टिप्पणियाँ/ प्राप्त हो चुके हैं और दो राज्यों, झारखंड और महाराष्ट्र, से नियमित अनुवर्ती कार्रवाई के टिप्पणियों अभी भी प्रतीक्षित हैं।