महामहिम की जवाबदेही से आदिवासी क्षेत्रों को नई ताकत 

सुधीर पाल 



सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार इस बात को लेकर मोर्चा खोले हुए है कि जब संविधान राष्ट्रपति और राज्यपाल को निर्णय लेने की समय-सीमा में नहीं बांधे हुए है तो कोर्ट क्यों निर्णय ले। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों और राष्ट्रपति के पास लंबित पड़े विधेयकों पर समय-सीमा तय करने का ऐतिहासिक फैसला दिया है, तो सवाल केवल विधेयक मंज़ूरी की देरी का नहीं है। 

प्रश्न यह है कि पाँचवीं और छठी अनुसूची जैसे विशेष संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद पिछले सात दशकों में राज्यपालों और राष्ट्रपति—दोनों ने ही इन संवैधानिक दायित्वों का पालन शायद ही कभी गंभीरता से किया। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला केवल सामान्य केंद्र-राज्य विवादों तक सीमित नहीं है, बल्कि पंचम् और षष्ठम् अनुसूची के क्षेत्रों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं और अधिकारों से भी गहराई से जुड़ा है। बहस इस पर नहीं है कि लोकतंत्र के संरक्षक के तौर पर राज्यपाल और राष्ट्रपति ने अपनी भूमिका नहीं निभाई है और इन्हें कैसे जवाबदेह बनाया जाए। 

संविधान सभा में जब पाँचवीं और छठी अनुसूची पर चर्चा हो रही थी, तब आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा ने साफ़ कहा था-
“आदिवासी समाज हजारों वर्षों से अपनी ग्रामसभाओं और पारंपरिक शासन व्यवस्था से चलता आया है। यह केवल प्रशासनिक संरचना नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। यदि संविधान इन परंपराओं को मान्यता नहीं देगा, तो आदिवासी समाज अपने को ठगा हुआ महसूस करेगा।”

इसी बहस के दौरान डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी स्पष्ट किया था कि 'अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन में राज्यपाल की भूमिका केवल औपचारिक नहीं होगी, बल्कि वह संरक्षक की तरह कार्य करेंगे।' लेकिन दुःख की बात है कि संविधान की यह दृष्टि कभी व्यवहार में नहीं उतरी। राज्यपाल राजनीतिक संतुलन साधने में उलझे रहे और राष्ट्रपति ने भी स्वतंत्र रिपोर्टों को नजरअंदाज कर दिया।

आदिवासी इलाकों में राज्यपालों की निष्क्रियता

पंचम् अनुसूची, विशेष रूप से, अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय समुदायों के प्रशासन से संबंधित है। इसके अंतर्गत, अनुच्छेद 244(1) स्पष्ट करता है कि अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों का शासन विशेष प्रावधानों के अधीन होगा। राज्यपाल को यह शक्ति दी गई है कि वह इन क्षेत्रों में लागू होने वाले किसी भी राज्य विधान को, चाहे पारित हो चुका हो, अस्वीकार, संशोधित या निलंबित कर सकता है। राज्यपाल पर यह संवैधानिक दायित्व डाला गया है कि वह समय-समय पर राष्ट्रपति को अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन पर स्वतंत्र और निष्पक्ष रिपोर्ट भेजें।

परंतु वास्तविकता यह है कि संविधान लागू होने के बाद से बार-बार रिपोर्टें समय पर और निष्पक्ष रूप में राष्ट्रपति को भेजे जाने का एक भी ठोस उदाहरण सामने नहीं आता। राज्यपालों ने इस शक्ति का उपयोग आदिवासियों के पक्ष में नीति-निर्माण को प्रभावित करने के लिए लगभग कभी नहीं किया।

राज्यपाल के वार्षिक प्रतिवेदन का मकसद राष्ट्रपति को उस वर्ष अनुसूचित क्षेत्र के प्रशासन, विकास, कल्याण-कार्यों की स्थिति के बारे में सूचित करना होता है। झारखंड जैसे राज्यों के इन प्रतिवेदनों में चल रही कल्याणकारी योजनाओं का विवरण, लाभार्थियों की संख्या, खर्च का ब्यौरा और बजटीय आवंटन शामिल होता है। लेकिन बहुतायत में ऐसे प्रतिवेदनों में इन क्षेत्रों में आदिवासियों के भूमि-अधिकारों की रक्षा, भूमि-हस्तांतरण पर रोक, जनजातीय परामर्शदात्री परिषद् के कार्य या प्रदर्शन का कोई जिक्र नहीं होता। इसके अलावा भूमि-अधिग्रहण, वन-अधिकार, खनन जैसे महत्वपूर्ण कानूनों के जनजातीय समुदायों पर पड़ने वाले प्रभावों को भी प्रतिवेदन में नहीं दर्शाया जाता।

संविधान की अपेक्षाओं और व्यवहार में भारी अंतर रहा है। 2016 में जब झारखंड की राज्य सरकार ने भूमि-अधिग्रहण और टेनेंसी कानूनों में संशोधन का प्रयास किया, तब राज्यपाल को संविधान की रोशनी में आदिवासी हितों की रक्षा करनी थी। लेकिन राज्यपाल की भूमिका केवल औपचारिक रही। झारखंड में खनन और ज़मीन अधिग्रहण के खिलाफ दर्जनों आंदोलन हो रहे हैं, लेकिन राज्यपाल मौन हैं। पेसा कानून राज्य में लागू नहीं है, राज्यपाल बेफिक्र हैं।   

छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम और नक्सल हिंसा में हजारों निर्दोष आदिवासी मारे गए, गाँव के गाँव जला दिए गए, राज्यपाल के कान पर जूं नहीं रेंगी। हँसदेव की जमीन लूट ली गयी, जंगल साफ हो गए, वनाधिकार को ठेंगा दिखाया जाता रहा, लेकिन राज्यपाल ने अपनी भूमिका नहीं निभाई। राज्य में पेसा कानून का क्रियान्वयन राज्यपाल के संरक्षण में होना था, परंतु ग्राम सभाओं को अधिकार देने की प्रक्रिया लगातार अधूरी पड़ी रही।

ढेबर आयोग सहित अनेक आयोगों ने जनजातीय परामर्शदात्री परिषद् को निष्क्रिय, कमजोर और अप्रभावी बताया है तथा इसे सशक्त बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। साथ ही राज्यपालों की भूमिका की भी आलोचना हुई है कि वे संवैधानिक जिम्मेदारी के बावजूद प्रशासन की वास्तविक चुनौतियों पर पर्याप्त रिपोर्टिंग नहीं करते।

2015 में केरल ने पांच जिलों में 2,133 बस्तियों, पांच ग्राम पंचायतों और दो वार्डों को अनुसूचित-क्षेत्रों के रूप में अधिसूचित करने का प्रस्ताव पारित किया था और इसे अब भी केंद्र सरकार और राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार है।

छठी अनुसूची पूर्वोत्तर भारत के राज्यों—असम, मेघालय, मिज़ोरम और त्रिपुरा के लिए एक विशेष व्यवस्था करती है। इसमें स्वायत्त जिला परिषदों की स्थापना की गई है, जिनके पास भूमि, संस्कृति, न्याय, वन, संसाधन और शिक्षा से जुड़े व्यापक अधिकार निहित हैं। लेकिन इन परिषदों के निर्णयों के निरीक्षण और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी भी अंततः राज्यपाल पर डाल दी गई है। राज्यपाल यहां भी अंतिम निर्णायक बनते हैं कि कोई प्रस्ताव लागू होगा या नहीं। पूर्वोत्तर में जातीय संघर्ष और संसाधनों पर विवाद स्थायी समस्या बने हुए हैं। छठी अनुसूची की परिषदों में बार-बार विवाद हुए, लेकिन गवर्नरों ने निर्णायक और संरक्षक की भूमिका शायद ही निभाई।

व्यवहार में देखा गया है कि राज्यपाल अक्सर इन परिषदों को न तो पर्याप्त अधिकारों के साथ कार्य करने देते हैं और न ही रिपोर्टिंग व निष्पक्ष निरीक्षण की अपनी भूमिका गंभीरता से निभाते हैं। परिणामस्वरूप, आदिवासी समाजों की वास्तविक आकांक्षाएं शासन-व्यवस्था में पूर्णतः परिलक्षित नहीं हो पातीं।

सुप्रीम कोर्ट की समय सीमा 

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 (जो कोर्ट को पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए कोई भी आदेश पारित करने की शक्ति देता है) का उपयोग करते हुए निम्नलिखित समय-सीमाएँ तय की है। राज्यपाल को बिल पर सहमति देना या असहमति जताना है तो यह 1 महीने के अंदर करना होगा। अगर बिल मनी बिल (वित्तीय विधेयक) नहीं है, तो उसे वापस करने के लिए 3 महीने का समय है। अगर बिल को राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजा गया है, तो उस पर फैसला 3 महीने के अंदर होना चाहिए। अगर विधानमंडल ने बिल को दोबारा पारित करके राज्यपाल के पास भेजा है, तो राज्यपाल को 1 महीने के अंदर सहमति देनी होगी। अगर कोई देरी होती है, तो राज्यपाल को लिखित में कारण बताना होगा और इसे राज्य सरकार को सूचित करना होगा। 

संविधान का अनुच्छेद 200 राज्यपाल को बिल पर सहमति देने, सहमति रोकने, बिल को (मनी बिल को छोड़कर) वापस भेजने और बिल को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखने का विकल्प देता है। अनुच्छेद 201 उन बिल्स से संबंधित है जो राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजे जाते हैं। पहले इसमें कोई समय-सीमा नहीं थी, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने समय-सीमा तय कर दी है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से काफी पहले सरकारिया आयोग (1988) और पुंछी आयोग (2007) ने सुझाव दिया था कि राज्यपालों को बिल्स पर फैसला करने के लिए समय-सीमा तय की जानी चाहिए। यह भी सुझाव दिया गया था कि राज्यपाल की नियुक्ति से पहले संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से सलाह ली जानी चाहिए।

राज्यपाल की जवाबदेही तय करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी हस्तक्षेप किया है। शमशेर सिंह (1974) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल को मंत्रिपरिषद् की सलाह पर काम करना चाहिए। एस.आर. बोम्मई (1994) मामले में राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल की भूमिका को न्यायिक समीक्षा के दायरे में लाने का फैसला दिया गया। रामेश्वर प्रसाद (2006) के मामले में राज्यपाल के व्यक्तिगत विवेक को सीमित किया गया।

आदिवासियों की संवैधानिक सुरक्षा को नई ताकत 

यह फैसला भारतीय लोकतंत्र के लिए ऐतिहासिक मोड़ है। यह न केवल राज्यों को राहत देता है, बल्कि अनुसूचित क्षेत्रों के लिए भी आशा की किरण है। अब समय है कि राज्यपाल अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाएँ। राष्ट्रपति भी आदिवासी हितों से जुड़ी स्वतंत्र और निष्पक्ष रिपोर्टों पर ध्यान दें। केंद्र सरकार और न्यायपालिका यह सुनिश्चित करें कि पाँचवीं और छठी अनुसूची के प्रावधान केवल किताबों में न रह जाएँ, बल्कि आदिवासी-जीवन की असली ढाल बनें। यह फैसला वास्तव में भारत के संघीय ढाँचे को मज़बूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। लेकिन इसकी असली कसौटी यही होगी कि क्या राज्यपाल और राष्ट्रपति अब सचमुच आदिवासी हितों और लोकतांत्रिक पारदर्शिता के संरक्षक बन पाते हैं या नहीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि आदिवासी क्षेत्रों की सतत् उपेक्षा की समस्या केवल समय-सीमा से हल नहीं होगी। लेकिन यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न केवल केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन लाता है, बल्कि भारत के सबसे कमजोर और हाशिए पर पड़े समुदायों, आदिवासियों, की संवैधानिक सुरक्षा को भी नई ताकत देता है।
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