वनाधिकार कोई ‘लाइसेंस टू किल फॉरेस्ट’ नहीं

सुधीर पाल 



अल्फ्रेड उरांव कहते हैं,अध्यक्ष महोदय! छोटानागपुर के जो बाशिंदे हैं उनका जंगल से संबंध है और वे जानते हैं कि जंगल ही हमारे जीवन-मरण का सवाल है। वे यह भी जानते हैं कि जंगल का रहना जरूरी है। छोटानागपुर के बाशिंदे यह नहीं चाहते हैं कि जंगल उजाड़ हो जाए और उसकी रक्षा ना हो। ठेकेदार-जमींदार से ठीका लेकर उसको उजाड़ने की कोशिश करें तो वे लोग उसकी रक्षा करते आए क्योंकि उन्हें जंगल की रक्षा करने में काफी इंटरेस्ट था। 

जंगल की रक्षा करने के लिए वे लोग अपनी तरफ से एक आदमी मुकर्रर करते थे और उनको मेहनताना भी देते थे। इसलिए उस आदमी के जरिए जंगल की देखभाल होती थी। इसके अलावा गांव के सब लोगों को जंगल से इंटरेस्ट था और हर एक आदमी उसकी निगरानी करते थे। लेकिन अब तो उन लोगों के बदले में फॉरेस्ट गार्ड वहां पर रख दिया गया है, उनके रहने से खर्च बढ़ता ही जा रहा है और जंगल की रक्षा भी नहीं हो रही है। 

इसका कारण यह है कि वे लोग जंगल की रक्षा करना नहीं चाहते हैं और ना वह ठीक से रक्षा ही कर सकते हैं। गांव वाले को तो को-ऑपरेशन से जंगल की रक्षा कर लेते हैं। इसलिए मेरा कहना है कि जंगल की रक्षा का इंतजाम गांव वालों के ही जिम्मे में सौंप दिया जाए। छोटानागपुर के रहने वाले तो जंगल की रक्षा करने वाली जाति है। फॉरेस्ट गार्ड जंगल में विहार करते हैं, जैसा कि हमारे दोस्त श्री हरमन लकड़ा ने बताया है।लेकिन फॉरेस्ट गार्ड से जंगल की रक्षा नहीं होती है। वे औरतों की साड़ी भी छीनने में हिचकते नहीं हैं। (बिहार विधान सभा वाद वृत, vol-l, no.34)

अल्फ्रेड उरांव, सिमडेगा (एसटी) से विधायक थे और मंगलवार, 1 जुलाई, 1952 को रिजर्वेशन ऑफ फॉरेस्ट पर बिहार विधान सभा में विमर्श में हिस्सा ले रहे थे। क्या सात दशकों के बाद भी सरकार और खासकर वन विभाग की मानसिकता में कोई बदलाव आया है? अभी हाल में उसी सिमडेगा के एक युवा डीएफओ ने बिल्कुल फिल्मी अंदाज में ग्राम सभाओं को फ़रमान दिया कि साबित करो कि तुम्हारे पूर्वजों ने जंगल बचाई है?    

बहरहाल भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट,2023 के प्रकाशन के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या वन अधिकार कानून की वजह से जंगलों की सघनता कम हो रही है। ऐसी दलील दी गई है कि वन अधिकार कानून लागू होने के बाद जंगलों की सघनता और संरक्षण में कमी आई है और जंगलों को नुकसान पहुंचा है। अच्छी बात यह है कि आदिवासी मामलों के मंत्रालय ने इस पर वन मंत्रालय से जवाब भी मांगा है। आदिवासी मंत्रालय ने वन मंत्रालय से उन तथ्यों, आंकड़ों और विशेषज्ञ अध्ययनों को उपलब्ध कराने का आग्रह किया है जिसके आधार पर यह कहा जा रहा है कि वनाधिकार से जंगलों को नुकसान पहुंचा है। 

क्या कहती है वन सर्वेक्षण रिपोर्ट?

वर्ष 2023 की 'भारत वन स्थिति रिपोर्ट' के अनुसार देश का कुल वन एवं वृक्षावरण 8,27,357 वर्ग किलोमीटर है, जो भारत के भौगोलिक क्षेत्र का 25.17% है। इसमें से वनावरण क्षेत्रफल 7,15,343 वर्ग कि.मी. (21.76%) तथा वृक्षावरण 1,12,014 वर्ग कि.मी. (3.41%) है। 2021 की तुलना में देश के वन एवं वृक्षावरण में कुल 1,445.81 वर्ग कि.मी. की वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें सीधे वनावरण की वृद्धि 156.41 वर्ग कि.मी. है। खास बात यह है कि वनाधिकार लागू होने के वर्षों बाद भी भारत में वन क्षेत्र व वृक्षावरण में वृद्धि दर्ज हो रही है, स्पष्टत: वनाधिकार के क्रियान्वयन ने जंगलों को हानि नहीं पहुँचाई

2006 में लागू वनाधिकार कानून का उद्देश्य आदिवासी एवं वनाश्रित समुदायों को उनके पारंपरिक वन अधिकार देना व वन संसाधनों पर उनके नियंत्रण को मान्यता देना है। वनाधिकार के मुख्य उद्देश्य हैं, सदियों से जंगल में रह रहे आदिवासी एवं वनाश्रित समुदायों के कानूनी अधिकारों को पहचानना और उन्हें सुरक्षा देना। जंगलों के सतत् संरक्षण में उनकी साझीदारी को मान्यता देना तथा ग्रामसभा की सहमति से सामुदायिक संसाधनों का प्रबंधन एवं संरक्षण। कानून की मूलभावना जंगल और समुदाय के सह अस्तित्व पर आधारित है। जंगलों के संरक्षण की भूमिका में यह वन विभाग की मोनोपली को तोड़ता है और समुदाय को भी बराबर की जिम्मेवारी सौंपता है।

क्या है सच्चाई?

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की रिपोर्ट भी मानती है कि वैश्विक स्तर पर जहां स्थानीय/आदिवासी समुदाय जंगल संरक्षण में शामिल हैं, वहां वनों की सुरक्षा और पुनरुत्थान की दर बाकी अन्य क्षेत्रों से ज्यादा है।
आईआईटी गांधीनगर और एफआरसी (फॉरेस्ट राइट्स कलेक्टिव) के संयुक्त अध्ययन  बताते हैं कि जिन गाँवों को सामुदायिक वनाधिकार (सीएफआर) प्राप्त हुआ है, वहाँ जंगल का घनत्व और विविधता अधिक पाई गई। मध्य भारत, खासकर गोंड, कोरकू और मुंडा बहुल क्षेत्रों में सीएफआर क्षेत्र की तुलना में राज्य द्वारा प्रबंधित जंगलों में अतिक्रमण और कटाई अधिक पाई गई।
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) का शोध (2021) बताता है कि  महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में जहां सीएफआर अधिकार दिए गए हैं, वहां वन आवरण में 10% से अधिक वृद्धि दर्ज की गई।  मध्‍य प्रदेश और ओडिशा के उदाहरण बताते हैं कि एफआरए के तहत सामुदायिक अधिकार मिलने के बाद स्थानीय समुदायों ने पारंपरिक जंगल प्रबंधन प्रणालियाँ फिर से लागू कीं हैं, जैसे कि "ठेका-बंदी", "निशानबंदी", "पतरोल" आदि।

झारखंड के ज्यादातर आदिवासी बाहुल्य जिलों में जंगलों के संरक्षण और संवर्धन की व्यवस्था ग्रामीणों की परंपरा का हिस्सा है। खूंटी जिले के मुरहू प्रखंड क्षेत्र में स्थित बुरुमा जंगल में हर साल एक बार ग्रामीणों की बैठक होती है। इस बैठक में चुना जाता है - बिर होरो नी। बिर होरो नी का मतलब है जंगल का रखवाला।  यही बिर होरो नी जंगलों की रखवाली करते हैं। एक साल के लिए एक बिर होरो नी को चुना जाता है।100 वर्षो से जंगल की रक्षा और रक्षक को रखने की परंपरा गांव में चली आ रही है। बगैर किसी सरकारी फंड और सरकार के भरोसे गांव वाले खुद जल, जंगल और जमीन की रक्षा बिर होरो नी: (जंगल का रखवाला) जैसी परंपरागत पद्धतियों से करते आ रहे हैं।

जंगल को आग से बचाने के लिए लातेहार जिला के बरवाडीह प्रखंड‌ अंतर्गत ततहा ग्राम सभा ने अपने जंगल में फायर लाईन बनाया है। इस फायर लाईन में ग्राम सभा अपने सीमा क्षेत्र में 10 फुट चौड़ा लाईन में सूखे पत्ते और झाड़ियों को अच्छी तरह साफ किया गया और छोटी झाड़ी, घास फूस को भी। ताकि दूसरे ग्राम सभा के जंगल से यदि आग फैलते हुए आए तो अपने ग्राम सभा की तरफ न बढ़ सके। वैज्ञानिक रूप से साबित है कि आग 10 फीट खाली जगह से पार होकर आगे नहीं बढ़ पाता है।  इससे ग्राम सभा ने अपने जंगल को आग से बचाया।  ग्राम सभा लोगों ने फायर लाईन गांव‌ चारों तरफ सीवाना में करीब 10 किलोमीटर से‌ भी अधिक‌ फायर लाईन बनाया है। यह काम ग्राम सभा सामुदायिक वन प्रबंधन‌ के अन्तर्गत‌ हुआ है। सामुदायिक वन संरक्षण के ये कुछ उदाहरण मात्र हैं। झारखंड सहित देश के अन्य हिस्सों में ऐसे सैकड़ों पहल ग्राम सभाओं द्वारा किये गये हैं।   

वनधिकार पर यह आरोप भी लगता रहा है कि इससे ‘भूमि हड़प’ या अतिक्रमण बढ़े हैं, लेकिन सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि अधिकांश मामलों में दिए गए भूमि अधिकार सीमित आकार के हैं और बड़े भूखंडों का हस्तांतरण बेहद कम हुआ है। अध्ययन दर्शाते हैं कि जिन जिलों-राज्यों में सामुदायिक वनाधिकार लागू हुए, वहां जैव विविधता एवं वन स्वास्थ्य बेहतर हुआ है। आदिवासी समाज जंगल को ‘आजीविका’ नहीं, ‘आस्तित्व’ मानता है; उसका संरक्षण, संवर्धन और पुनःस्थापन उनकी संस्कृतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

कौन कर रहा है जंगलों का नुकसान?

असली संकट बड़ी परियोजनाओं और वन भूमि डायवर्जन से है। आँकड़ें बताते हैं कि वाणिज्यिक परियोजनाएँ वन क्षेत्र का सबसे ज्यादा ह्रास कर रहे हैं। 2006-2022 के बीच फॉरेस्ट क्लियरेंस रिपोर्ट बताती है कि करीब 14,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक वन भूमि का डायवर्जन किया गया है। ये डायवर्जन कोयला खनन, बांध परियोजनाएँ और रेल/सड़क निर्माण के लिए किये गए हैं। यह वनाधिकार के अंतर्गत हुए दावों से कई गुना अधिक वन ह्रास को दर्शाता है।
आँकड़ें बताते हैं कि जंगल कटाई के प्रमुख कारणों में खनन का योगदान लगभग 30%, बड़े बांध और उधयोग का योगदान 25%, वाणिज्यिक लकड़ी कटाई का योगदान 15%, आग, चराई, जलवायु प्रभाव 10% है जबकि स्थानीय समुदायों की गतिविधि का योगदान 5% से भी कम है। 

जमीन और समुदायों के संबंध पर नजर रखने वाली संस्था ‘लैंड कॉन्फ्लिक्ट वॉच’ के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि ग्राम सभाओं से मंजूरी नहीं मिलने की वजह से देश में खनन, स्टील और पावर सेक्टर में होने वाले लगभग साढ़े तीन लाख करोड़ का निवेश फंस गया है। और लगभग 47 लाख हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण लंबित है। वनाधिकार कानून की आलोचना का यही मूल प्रश्न है। 
वनाधिकार कोई ‘लाइसेंस टू किल फॉरेस्ट’ नहीं, बल्कि ‘लाइसेंस टू सेव फॉरेस्ट’ है। यह जंगल और जंगलवासियों के बीच टूटे हुए रिश्ते को जोड़ने की कोशिश है, जो ब्रिटिश वन कानूनों और उसके उपरांत संरचनात्मक दमन से टूटा था।
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