हर वर्ष 9 अगस्त को जब विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है, तो मंच सजते हैं, आदिवासी गीतों की धुनें बजती हैं, रंग-बिरंगे परिधानों में पारंपरिक नृत्य होते हैं, और भाषणों की झड़ी लग जाती है। यह दिन प्रतीक बन गया है आदिवासियों की सांस्कृतिक विविधता और जीवन दर्शन का—जो मानव सभ्यता को यह याद दिलाता है कि पृथ्वी पर सहअस्तित्व, साझेदारी और सीमित उपभोग का भी एक रास्ता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस दिन को केवल सांस्कृतिक उत्सव बनाकर हम उस मूल संघर्ष को भुला नहीं रहे हैं जो आदिवासी समाज आज भी लड़ रहा है? क्या यह दिन एक जिम्मेदारी नहीं बन जाना चाहिए—देश, राज्य, सरकार और समाज के लिए—कि वे अपनी नीतियों और दृष्टिकोणों में आदिवासियों को केवल 'पिछड़ा वर्ग' मानने की जगह उन्हें उनके संवैधानिक अधिकारों के साथ पहचानें और उनका सम्मान करें?
सहअस्तित्व बनाम उपनिवेशवाद: दो जीवन दृष्टियाँ
आदिवासी समाज की जीवन पद्धति सदा से भूमि, जल, जंगल और जीवों के साथ गहरे जुड़ाव पर आधारित रही है। यह एक ऐसी सभ्यता है जिसने 'स्वामित्व' नहीं, 'साझेदारी' का दर्शन दिया।
इसके ठीक विपरीत, आधुनिक राज्य और विकास की अवधारणा उपनिवेशवाद से उपजी है—जहां प्रकृति को 'संसाधन' माना गया और मानव को उसका 'उपभोक्ता'। यही टकराव है जो आदिवासी समाज को बार-बार विस्थापन, दमन और उपेक्षा की गर्त में ढकेलता रहा है।
धराली, उत्तरकाशी की सुंदर घाटी में बसा वह शांत गांव, जो अपने सेब के बागानों और हिमालय की गोद में बसे सौंदर्य के लिए जाना जाता था, आज प्राकृतिक आपदा की मार से जूझ रहा है। हाल ही में आई भारी बारिश और बादल फटने की घटनाओं ने धराली को हिला कर रख दिया। भागीरथी नदी का जलस्तर अचानक बढ़ गया, जिससे नदी किनारे बसे मकान, पुल और खेत पानी में समा गए।
धराली की यह त्रासदी केवल एक गांव की नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते पर्यावरणीय असंतुलन की चेतावनी है। अंधाधुंध निर्माण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन ने इस सुंदर बस्ती को तबाही की कगार पर ला खड़ा किया है। यह समय है जब हम प्रकृति के संकेतों को गंभीरता से लें।
राज्य खुद अतिक्रमणकारी बन जाए तो....
आज देश की अधिकांश खनिज संपदा, जल संसाधन और वन क्षेत्र उन्हीं इलाकों में स्थित हैं जहाँ आदिवासी निवास करते हैं—छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, नागालैंड, मिज़ोरम, त्रिपुरा, आदि।
यह संयोग नहीं, बल्कि इतिहास की विडंबना है कि इन क्षेत्रों में सबसे अधिक खनन परियोजनाएं, बड़े बांध, औद्योगिक कॉरिडोर और सड़कों की परियोजनाएं प्रस्तावित हैं।
इन तथाकथित 'विकास' योजनाओं की कीमत पर न केवल आदिवासी अपनी जमीन और जंगल से बेदखल हो रहे हैं, बल्कि उनके विश्वास, परंपराएं, समाज संरचना और राजनीतिक स्वायत्तता भी नष्ट हो रही है।
ठीक आदिवासी दिवस के करीब हजारों आदिवासी हसदेव अरण्य क्षेत्र को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने हसदेव अरण्य क्षेत्र में केंटे विस्तारित कोयला परियोजना को मंजूरी दे दी है। इसके लिए 1742 हेक्टेयर घने वन भूमि को नष्ट करना आवश्यक है। यह मंजूरी सरगुजा जिला वन अधिकारी द्वारा स्थल के तथाकथित निरीक्षण के बाद दी गई है।
यदि यह परियोजना लागू हो जाती है, तो पहले से ही बुरी तरह प्रभावित उन क्षेत्रों में और भी ज़्यादा तबाही मच जाएगी जहाँ खनन कार्य चल रहा है। आधिकारिक निरीक्षण रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम 4.5 लाख पेड़ काटे जाएँगे। ये पेड़ घने जंगल में हैं, जहाँ कार्बन अवशोषण के लिए महत्वपूर्ण देशी पेड़ बहुतायत में हैं। इस क्षेत्र में खुले में खनन से पहले ही हज़ारों पेड़ नष्ट हो चुके हैं, पानी और ज़मीन प्रदूषित हो चुकी है।
आदिवासी समाज का जंगल से रिश्ता केवल ईंधन या लकड़ी का नहीं है। यह उनकी आस्था, चिकित्सा, संस्कार, विवाह, मृत्यु और हर जीवन प्रसंग से जुड़ा होता है। जंगल में मौजूद हर पेड़, पत्थर, नदी और पहाड़ उनके देवता, पूर्वज, संरक्षक और सहचर हैं। जब सरकार एक पहाड़ को खनन के लिए दे देती है, तो वह केवल भूमि हस्तांतरण नहीं करती, वह एक सभ्यता को निराश्रित बना देती है।
1950 से अब तक लगभग 5 करोड़ लोग विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित हुए हैं, जिनमें 40% से अधिक आदिवासी हैं। केवल झारखंड में पिछले दो दशकों में 12 लाख से अधिक लोग अपनी जमीन से बेदखल हुए। 2006 में बने वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत जिन अधिकारों को मान्यता दी गई, उनकी 70% से अधिक दावेदारियाँ अभी तक लंबित हैं या खारिज कर दी गई हैं।
'आदिवासी' को संस्कृति में सीमित करना एक नई औपनिवेशिकता है
आजकल हम 'आदिवासी संस्कृति' को उत्सवों, मेलों और पर्यटन का हिस्सा बनाकर गौरव से प्रस्तुत करते हैं—उनके गीत, नृत्य, पहनावे, और खानपान को। लेकिन हम भूल जाते हैं कि यह संस्कृति एक राजनीतिक सत्ता और सामुदायिक अधिकारों पर आधारित रही है।
उदाहरणस्वरूप, पेसा कानून (1996) कहता है कि ग्रामसभा खनन, भूमि अधिग्रहण, शराब दुकानें, और सामाजिक न्याय के निर्णय ले सकती है। वनाधिकार कहता है कि आदिवासी समुदाय को सामूहिक वन अधिकार दिए जाने चाहिए। पाँचवीं अनुसूची कहती है कि अनुसूचित क्षेत्रों में राज्यपाल को विशेष शक्तियां हैं आदिवासी हितों की रक्षा के लिए। लेकिन विडंबना यह है कि इन सभी संवैधानिक प्रावधानों को या तो लागू नहीं किया गया है, या उनका उल्लंघन राज्य की नीतियों में नियमित रूप से होता है।
क्या है आदिवासी दिवस का सही अर्थ?
विश्व आदिवासी दिवस महज़ एक "सांस्कृतिक शोकेस" नहीं है। यह एक राजनीतिक और नैतिक चेतावनी का दिन है। यह हमें याद दिलाता है कि- क्या हमने आदिवासियों को सिर्फ लोकनृत्य और हस्तशिल्प तक सीमित कर दिया है? क्या हमारे संविधान के अनुच्छेद 244, पेसा, FRA और अन्य कानून सिर्फ किताबों में हैं? क्या ग्रामसभाएं वाकई सशक्त हैं, या वे केवल दिखावा बनकर रह गई हैं? क्या हम यह मान चुके हैं कि विकास का मतलब है आदिवासियों की कीमत पर आगे बढ़ना?
एक नई सोच की ज़रूरत
अगर हमें भारत को एक वास्तविक लोकतंत्र बनाना है, तो विकास की परिभाषा को बदलना होगा। विकास वह हो जो स्थानीय समाज की सहमति से, ग्रामसभा के निर्णय से, और प्राकृतिक संतुलन को ध्यान में रखकर हो। हमें 'विकास' से पहले 'न्याय' और 'अधिकार' की चर्चा करनी होगी। आदिवासी समुदायों को केवल सहभागी नहीं, बल्कि निर्णयकर्ता बनाना होगा।
आदिवासी महिलाएं: दोहरी मार
आदिवासी महिला, जो जंगल की पहरेदार भी है और समाज की रीढ़ भी, उसे सबसे अधिक झटका लगता है जब विस्थापन होता है। उसके लिए जंगल भोजन, दवा, ईंधन, सुरक्षा और आत्मसम्मान का स्रोत है। लेकिन विकास योजनाओं में महिला की कोई भूमिका नहीं होती। पेसा और वन अधिकार दोनों में महिलाओं की भागीदारी का ज़िक्र है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर महिलाओं को अक्सर ग्रामसभा में बोलने तक का अवसर नहीं मिलता।
आगे क्या करें
राज्यों को चाहिए कि वे पेसा और FRA का पूर्ण और ईमानदार क्रियान्वयन सुनिश्चित करें। ग्रामसभा की सहमति के बिना कोई भूमि अधिग्रहण, खनन या उद्योग न हो। आदिवासी युवाओं और महिलाओं को अधिकारों की संवैधानिक शिक्षा दी जाए। न्यायपालिका और प्रशासन को संवेदनशील बनाया जाए कि वह आदिवासी दृष्टिकोण को समझे। मीडिया और शिक्षण संस्थानों को चाहिए कि वे आदिवासी समाज की वास्तविक चुनौतियों को प्रस्तुत करें, केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं।
शपथ लेने का दिन
विश्व आदिवासी दिवस एक शपथ लेने का दिन होना चाहिए—कि हम आदिवासियों को सिर्फ 'उत्सव की वस्तु' नहीं, बल्कि 'न्याय का विषय' मानेंगे। यह जश्न नहीं, जिम्मेदारी है—प्रकृति के उन बच्चों के लिए जिनकी भूमि पर खनन होता है, लेकिन जिन्हें मुआवज़ा नहीं मिलता। जिनकी भाषा लुप्त हो रही है, लेकिन जिनकी संवेदनशीलता आज भी दुनिया को जीवन का अर्थ सिखा सकती है। 9 अगस्त को जब हम ढोल और मांदर की आवाज़ सुनें, तो केवल संगीत न सुनें—बल्कि उस आवाज़ के पीछे का संघर्ष, पुकार और अधिकार की आहट भी सुनें।