खट्टी-मीठी इमली की गोलियाँ हमेशा से मेरी कमज़ोरी रही हैं। याद है बचपन में, जब हल्के पीले पारदर्शी कागज़ में लिपटी छोटी-सी गोल इमली मिलती थी, तो बस दिल खुश हो जाता था। दही-बड़े पर भी अगर किसी चीज़ ने हमेशा स्वाद जीता, तो वो थी इमली की चटनी।
लेकिन नौकरी की भागदौड़ में ये दोस्ती जैसे कहीं खो सी गई थी। तब तक, जब तक कि एक दिन एयर इंडिया की फ्लाइट में उड़ान भरते वक़्त एयर होस्टेस ने ठंडी खुशबूदार तौलिया के साथ एक ट्रे मेरी ओर बढ़ाई। उसमें रखी इमली की गोलियाँ देखकर जैसे दिल ने कहा—“फ्लाइट में चढ़ने का दाम वसूल हो गया।”
बाज़ार और मॉल कल्चर के इस ज़माने में मैंने कभी खुलकर नहीं कहा कि मुझे इमली की गोलियाँ पसंद हैं—सोचती थी लोग मुझे ‘मिडिल क्लास’ कहेंगे। लेकिन सच्चाई कब तक छिपती? माँ बनने के बाद मैंने पाया कि यह स्वाद मैंने अपने बेटे को भी दे दिया है। माँ जब भी घर आतीं, चुपके से मेरी स्टॉक से इमली की गोलियाँ गायब कर देतीं। और मेरे शांत पति साहब भी चोरी करते, पकड़े जाने पर कहते—“तो क्या हुआ, एक खा ली तो?”
धीरे-धीरे एहसास हुआ कि मैं अकेली नहीं हूँ। कई लोग हैं जो एक्लेयर छोड़कर इमली की गोली ही चुनेंगे। असली ‘देसी’ स्वाद यही है।
हमारे झारखंड की छोटानागपुर क्षेत्र, इमली के पेड़ों से भरी पड़ी है। ‘पलाश’ ब्रांड, जिसे जेएसएलपीएस बढ़ावा देता है, इमली की ईंटें बनाता है। दक्षिण भारत में, बड़े खरीदार बीज निकाले हुए, रेशों से रहित इमली की गूदेदार ईंटें माँगते हैं।
जब मैंने LIVE FOUNDATION शुरू किया, तो इमली भी हमारी चर्चाओं का हिस्सा बनी। कई बार दीदियों से मुलाक़ात हुई जो इमली की ईंटें बनाती हैं। हालांकि सौदे हमेशा पूरे नहीं हुए, क्योंकि उनके लिए बीज निकालकर गूदा तैयार करना आसान नहीं था। लेकिन चर्चाएँ कभी बंद नहीं हुईं।
पिछले महीने टोंटो ब्लॉक के कुदमसाड़ा गाँव में मैं इमली के पुराने पेड़ों के नीचे बैठी थी। मैंने कहा—“कितने पुराने पेड़ हैं, सौ-सौ साल से ज़्यादा।”
एक सत्तर साल की बुज़ुर्ग बोलीं—“ये हमारे सुरक्षा कवच हैं।”
मैं चौंकी—“सुरक्षा? हाथी से?”
वो हँसीं—“नहीं, बिजली से।”
बिजली! मैंने पहली बार सुना। वो बोलीं—“इमली के पेड़ बिजली को खींचकर धरती में उतार देते हैं। दूसरे पेड़ जलकर राख हो जाते हैं, लेकिन इमली प्राकृतिक अर्थिंग की तरह काम करती है। जब तक बिजली बहुत तेज़ न हो, हमें कुछ नहीं होता। इसी वजह से हर गाँव इमली के पेड़ों के पास बसता है।”
उनकी बात दिल में उतर गई।
अभी रविवार को, बड़ा झिंझकपानी के पास मैंने एक विशाल इमली का पेड़ देखा, जिसकी छाँव लगभग 1500 वर्ग फुट में फैली थी। एक आदमी उसके नीचे आराम कर रहा था और गायें चर रही थीं। मुझे उस दृश्य ने बहुत सुकून दिया।
उसी रात तेज़ बारिश हुई। बिजली गरज-गरजकर गिर रही थी। अचानक लगा कि बिजली कहीं पास गिरी है।
अगली सुबह रास्ते में देखा—वही इमली का पेड़ धराशायी है और उसके बीच से धुआँ निकल रहा था। बारिश के बावजूद उसका तना सुलग रहा था। अगले दिन भी धुआँ उठता रहा। तीसरे दिन भी।
हैरानी यह थी कि उसकी डालियाँ हरी थीं, फलों को कुछ नहीं हुआ, जीव-जंतु सुरक्षित थे। बस तना जलता रहा।
आज मैंने उस पेड़ को प्रणाम किया। उसने बिजली अपने ऊपर ली थी, ताकि आसपास की ज़िंदगी सुरक्षित रहे। मुझे लगा, प्रकृति के पास हमेशा सीख है—बलिदान की, सुरक्षा की, धैर्य की। बस हमें सुनना सीखना होगा।
और उस दिन मैंने जाना कि जलवायु परिवर्तन को पलटना शायद उतना कठिन न हो—अगर हम अपने पूर्वजों की बात सुनें, अपने आसपास देखें और प्रकृति को वैसे ही अपनाएँ जैसे उन्होंने किया था।
और हाँ—इमली के प्रति मेरा प्रेम अब सिर्फ़ बचपन की याद नहीं रहा। यह मेरे लिए प्रकृति की सहनशीलता और त्याग का प्रतीक बन चुका है।