जिन गाँवों को संविधान की पाँचवीं अनुसूची और पेसा कानून ने ‘स्वशासी’ माना है, आज वहीं से खबरें आ रही हैं —
‘गाँव में घुसने पर रोक लगा दी गई…’
‘चरवाहा समुदाय को मवेशी चराने के लिए बाध्य करना…’
‘डायन करार देकर महिला की हत्या....’
इन पंक्तियों को पढ़ते हुए क्या यह यकीन किया जा सकता है कि ये वही गाँव हैं जिन्हें ‘ग्राम सभा सर्वोच्च है’ कहकर सम्मानित किया जाता है? क्या यह वही स्वशासन है जिसकी कल्पना आदिवासी आत्मनिर्णय, सामूहिक न्याय और लोकतांत्रिक भागीदारी के रूप में की गई थी? या फिर यह स्वशासन नया शोषण, नया बहिष्कार और नया पितृसत्तात्मक नियंत्रण का केंद्र बनता जा रहा है?
जब भारतीय संविधान ने पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आदिवासी क्षेत्रों को विशेष संरक्षण देने की बात की, और जब 1996 में ‘पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम’ यानी पेसा आया, तो उसकी आत्मा में यह निहित था कि आदिवासी समाज को अपने तरीके से जीने, फैसले लेने, और सामूहिक रूप से न्याय करने का अधिकार मिलना चाहिए। ग्राम सभा को सर्वोच्च संस्था माना गया। माना गया कि यहाँ निर्णय-प्रक्रिया लोकतांत्रिक, सहभागी और सामाजिक न्याय की भावना से ओत-प्रोत होगी।
लेकिन आज कई गाँवों से ऐसी खबरें आ रही हैं जो इन मूलभूत सिद्धांतों को झकझोरती हैं। सवाल उठता है कि क्या स्वशासन की यह व्यवस्था शोषण का नया औजार बनती जा रही है?
सामाजिक बहिष्कार ‘हथियार’
गाँवों में सामाजिक बहिष्कार अब एक नया ‘हथियार’ बन गया है। प्रेम विवाह किया? – बहिष्कार। महिला ने शराबबंदी पर आवाज़ उठाई? – बहिष्कार। आदिवासी युवक ने परंपरा को चुनौती दी? – बहिष्कार। कोई शिक्षित आदिवासी महिला ज़मीनी हक़ की बात करे? – बहिष्कार। और यह सब होता है परंपरा के नाम पर और ‘ग्राम सभा’ की स्वीकृति से। बहिष्कार का मतलब है- पानी नहीं मिलेगा, खेत में घुसने नहीं देंगे, श्मशान में दाह-संस्कार नहीं करने देंगे, सामाजिक उत्सवों से बाहर कर देंगे। यह ‘निर्दोष की सामूहिक सजा’ है, जो पूरी तरह से असंवैधानिक और अमानवीय है।
यह स्थिति स्पष्ट करती है कि जब तक निर्णय प्रक्रिया सभी के लिए खुली, समान भागीदारी वाली, और न्याय-सम्मत नहीं होगी, तब तक स्वशासन का नाम लेकर भी शोषण ही होगा। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि स्वशासन की संस्था जिसे लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण होना चाहिए था, अब कई स्थानों पर बहिष्कारी, पितृसत्तात्मक और संकीर्ण होती जा रही है।
न्यायिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप बढ़े
अब सवाल यह उठता है कि आदिवासी समुदाय के लोगों के समक्ष न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने की नौबत कब आती है? भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13(3) में 'प्रथा' को कानून का सर्वप्रथम श्रोत कहा गया है। किसी भी अदालत को प्रथागत कानून से संबंधित निर्णय लेने से पहले कुछ मौलिक प्रश्नों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए 'प्रथा क्या है?' प्रथाओं को कैसे साबित किया जा सकता है?'प्रथाओं' का प्रयोग किसी विशेष परिस्थितियों में कैसे किया जा सकता है?'और प्रथाओं की संवैधानिक वैधता क्या है? इस प्रश्न के जवाब में तीन बातों का ख्याल रखा जाना अनिवार्य है।सर्वप्रथम, किसी भी प्रथा अथवा परंपरा का लंबे समय से पालन किया जा रहा हो, समुदाय ने उस प्रथा को इस हद तक अपना लिया हो कि उसका पालन न करना प्रतिबंध के दायरे में आता हो और ये प्रथायें किसी भी तरह से अविवेकी अथवा लोक नीति के विरुद्ध न हों। भारतीय संविधान के पांचवीं अनुसूची के तहत प्रथागत कानून को मान्यता प्रदान की गई है, बावजूद इस तथ्य के कि ये फिलहाल सूचीबद्ध नहीं हैं।
देखा जा रहा है कि शोषण के नए रूप में बहिष्कार, जुर्माना और मानसिक हिंसा को हथियार बनाया जा रहा है। आदिवासी परंपरागत व्यवस्था को समाज के भीतर से ही चुनौती मिल रही है। कई तुगलकी फैसलों के खिलाफ समाज के ही लोग न्यायालय और प्रशासन के पास न्याय के लिए पहुंच रहे हैं। लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने कई मामलों में परंपरा के रूढ़ प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी 17 जुलाई को आदिवासी महिलाओं को पैतृक संपत्ति में समान हिस्सेदारी का हकदार बताया है। सुप्रीम कोर्ट की मान्यता है कि महिला उत्तराधिकारी को संपति में अधिकार देने से इनकार करने से लैंगिक विभाजन और भेदभाव बढ़ता है,जिसे कानून द्वारा समाप्त किया जाना चाहिए। झारखंड हाई कोर्ट ने भी निर्मला मिंज के मामले में लगभग यही रुख अपनाया था।
हाल ही में झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर के गुलकोड़ा पंचायत के लुपुगबेड़ा गांव के गोप समुदाय के दर्जनों परिवारों का सामाजिक बहिष्कार किया गया है। उनका अपराध था कि उन्होंने मवेशी चराने से इनकार किया था। गोप समुदाय के लोगों ने जिले के उपायुक्त से मिलकर इस घटना की जानकारी दी। उपायुक्त ने हूकुकनामा की शर्त 22 से 29 में वर्णित प्रावधानों के तहत उपायुक्त ने मुंडा बाग़ुन जामुदा को बर्खास्त कर दिया है।
ऐसे ही अन्य मामले में पूर्वी सिंहभूम की सिविल जज सुशीला सोरेंग के कोर्ट ने 23दिसंबर 2024को मांझी परगना महाल के चार परंपरागत अगुवाओं पर 10 लाख का जुर्माना लगाया है। आरोप था कि मांझी परगना महाल के प्रमुख अगुवाओं द्वारा 6 दिसंबर 2015 को पूर्व सांसद सालखन मुर्मू के सामाजिक बहिष्कार का फैसला सुनाया गया था।
नौवें दशक में संथाल परगना में प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद बिटलाहा जैसे घोर महिला विरोधी और अमानवीय सामाजिक बहिष्कार की घटनाएं बंद हुई। कई गाँवों में महिलाओं को नाचने, बोलने, या सामाजिक मंचों पर हिस्सा लेने से रोका जा रहा है। उन्हें 'ग्राम संस्कृति की रक्षा' के नाम पर सीमित किया जा रहा है। झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में विधवा महिलाओं, परित्यक्ता, एलजीबीटीक्यू+ व्यक्तियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भी सामाजिक फैसले लिए जा रहे हैं।
पेसा का सपना और उसकी सच्चाई
पेसा में स्पष्ट प्रावधान है कि ग्राम सभा को ग्राम स्तर पर सामाजिक न्याय, संपत्ति का संरक्षण, खनिज संसाधनों पर नियंत्रण, और स्थानीय विवादों का समाधान करने का अधिकार होगा। परंतु यह अधिकार लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक मर्यादाओं के अंतर्गत ही होना चाहिए। लेकिन कई बार देखा गया है कि यह अधिकार निजी प्रतिशोध, जातिगत घृणा, और पुरुषवादी सोच का औजार बन जाता है।
स्वशासन का मतलब कभी भी यह नहीं था कि कोई भी समुदाय या व्यक्ति अन्य को गैर-संवैधानिक तरीके से सजा दे। लेकिन आज ग्राम सभा का निर्णय अक्सर अंधविश्वास, पंथिक कट्टरता, या गुटीय राजनीति से प्रभावित हो जाता है। व्यक्तिगत आज़ादी का उल्लंघन होने लगता है खासकर महिलाओं, दलितों, वंचितों और प्रवासी मजदूरों की आजादी का।
स्वशासन और पितृसत्ता का गठजोड़
आदिवासी समाजों में जहाँ एक ओर समूहवाद और सामूहिक निर्णय की परंपरा रही है, वहीं दूसरी ओर यह भी सच है कि महिलाओं को निर्णय प्रक्रियाओं में बराबर स्थान नहीं मिला है। आज पेसा या एफआरए जैसे कानूनों के तहत महिलाओं को ग्राम सभा का हिस्सा माना गया है, लेकिन हकीकत में क्या महिलाएं बोल पाती हैं? कई स्थानों पर देखा गया है कि महिलाओं को ग्राम सभा से बाहर रखा जाता है। ‘बदचलन’ करार देकर महिलाओं का सामाजिक बहिष्कार किया जाता है। जिन महिलाओं ने शराब बंदी, भूमि अधिकार या यौन हिंसा पर आवाज़ उठाई है, उन्हें चुप करा दिया गया है। ऐसे में सवाल है — क्या यह स्वशासन है? या यह उस पितृसत्तात्मक सोच का विस्तार है जो हर स्त्री की स्वतंत्रता से डरती है?
संवैधानिकता बनाम परंपरा
भारत का संविधान हर व्यक्ति को आवाज उठाने, घूमने, धार्मिक स्वतंत्रता, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और सम्मान से जीने का अधिकार देता है। लेकिन जब ग्राम सभा किसी को गाँव में आने से रोक देती है, जब किसी को ‘चरित्रहीन’ कहकर उसकी सामाजिक हत्या की जाती है, तो वह सीधे-सीधे संविधान की धारा 14 (समानता), 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है। संविधान का अनुच्छेद 13 यह स्पष्ट करता है कि कोई भी परंपरा, प्रथा या नियम जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, अमान्य होगा। स्वशासन का मतलब यह नहीं है कि कोई समूह संविधान के ऊपर हो जाए।
क्या है समाधान?
आदिवासी समाज उदार और लोकतंत्र पसंद समाज है। स्त्री-पुरुष समानता का व्यवहारिक स्वरूप यहाँ देखने को मिलता है। आदिवासी समाज को अपने भीतर परंपराओं के परिमार्जन की प्रक्रिया चलानी चाहिए। ग्राम सभा के सदस्यों को संविधान, मानवाधिकार, पेसा और एफआरए के वास्तविक प्रावधानों की जानकारी दी जाए। महिलाओं और युवाओं को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाए। ग्राम सभा के फैसलों की रिकॉर्डिंग, अपील व्यवस्था, और जवाबदेही तंत्र विकसित हो, ताकि मनमानी रोकी जा सके। आदिवासी समाज की परंपराओं का सम्मान करते हुए उन्हें संवैधानिक मूल्यों से जोड़ा जाए। न कि उनकी आड़ में संविधान का गला घोंटा जाए। ग्राम सभाओं में महिला अध्यक्षता, महिला मंच, और सुरक्षित बोलने का वातावरण सुनिश्चित किया जाए।
आदिवासी स्वशासन की नींव विश्वास, साझेदारी, और सामाजिक न्याय पर रखी गई है। अगर यह डर, बहिष्कार, और वर्चस्व की राजनीति का केंद्र बनती जा रही है तो यह बेहद चिंताजनक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वशासन का मतलब ‘ग्राम का राजा’ होना नहीं है। बल्कि यह हर व्यक्ति, चाहे वह महिला हो, दलित हो, चरवाहा हो या कोई और सम्मान के साथ अपनी बात कह सके, निर्णय का हिस्सा बन सके, और न्याय पा सके, ऐसी व्यवस्था हो तभी स्वशासन सार्थक है।