'शैतान ही जानता है, चुनाव के लिए कैसी-कैसी चालें चली जाती हैं, कैसे-कैसे दाँव खेले जाते हैं। अपने प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने के लिए बुरे से बुरे साधन काम में लाये जाते हैं। जिस दल के पास धन ज्यादा हो और कार्यकर्ता कैनवेसर अच्छे हों, उसकी जीत होती है। ... ऐसे ही स्वार्थी, आदर्शहीन, विवेकहीन मनुष्यों के हाथ में संसार का शासन है। फिर अगर संसार में स्वार्थ का राज्य है, तो क्या आश्चर्य। ' (मार्च 1930 के
'हंस' पत्रिका के प्रवेशांक में प्रेमचंद )
प्रेमचंद का रचना-काल 1907 से 1936 तक फैला हुआ है। लेकिन प्रेमचंद युग द्रष्ट्रा थे। लगता है वे
महाभारत के संजय की तरह आने वाले युग को देख रहे थे। 1930 में 2025 को देख रहे थे और संभव है, 2125 को भी देख रहे हों। औपनिवेशिक दासता खत्म होने के अमृत बेला में भी हम भरोसा करने की स्थिति में नहीं है कि हम वाकई लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्य के नागरिक हैं।
क्या प्रेमचंद आज की भारत को देख रहे थे?
भारत में आर्थिक असमानता पिछले एक दशक में अत्यधिक बढ़ी है।
ऑक्सफैम की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 1% अमीरों के पास देश की 40% संपत्ति है, जबकि निचले 50% आबादी के पास केवल 3%। गरीबों की आवाज़ लोकतांत्रिक प्रक्रिया में खोती जा रही है, क्योंकि पूंजी का प्रभाव चुनाव प्रणाली पर हावी होता जा रहा है। बेरोज़गारी दर पिछले 45 वर्षों में सबसे उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है।
शिक्षण संस्थानों का सांप्रदायिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण, पाठ्यक्रम में बदलाव, और शिक्षा में निजीकरण ने जनतांत्रिक शिक्षा प्रणाली को कमजोर किया है। आदिवासी क्षेत्रों में खनन, भूमि अधिग्रहण, वनाधिकार का हनन, ने लोकतंत्र को "विकास के नाम पर विस्थापन" में बदल दिया है। सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं, खासकर जब राजनीतिक मामलों में फैसले या चुप्पी सामने आई है।
चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाओं की निष्पक्षता पर राजनीतिक दुरुपयोग के आरोप लगातार लगते रहे हैं। विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई और सत्तारूढ़ दलों की अनदेखी से संस्थागत भरोसा कमजोर हुआ है।
इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की रिपोर्ट चुनावी प्रक्रिया, सरकार की कार्यप्रणाली, राजनीतिक सहभागिता, राजनीतिक संस्कृति और नागरिक स्वतंत्रताओं के आधार पर हर वर्ष
"डेमोक्रेसी इंडेक्स" जारी करता है। 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भारत की रैंकिंग 108 देशों में 53वें स्थान पर है।
अमेरिका स्थित
फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में भारत का कुल स्कोर 100 में से 66 रहा, जिसमें राजनीतिक अधिकारों में गिरावट, असहमति की आवाज़ों पर हमले, और एक समुदाय विशेष पर लक्षित हिंसा को उजागर किया गया। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के भारत की प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2024 में रैंकिंग 180 देशों में 161वीं रही।
प्रेमचंद स्वयं चुनावी राजनीति का हिस्सा नहीं बने, पर उन्होंने जिस संवेदनशीलता और यथार्थवाद के साथ भारतीय लोकतंत्र के आरंभिक स्वरूप और चुनावी व्यवस्था की विसंगतियों पर सवाल उठाए, वह आज भी बेहद प्रासंगिक हैं। चाहे उनकी कहानियाँ हों, उपन्यास हों या हंस और जमाना में लिखे गए संपादकीय, हर जगह चुनाव की प्रक्रिया और सत्ता की प्रवृत्तियाँ खुलकर उभरती हैं।
1933 के '
जागरण' में उन्होंने लिखा-
‘एसेम्बली तथा कौंसिलों में द्वितीय श्रेणी के राजनीतिज्ञ और तृतीय श्रेणी के विचारक एकत्रित हो गये हैं, जिन्होंने केवल जनता के प्रतिनिधित्व के बल पर अपना विज्ञापन किया है, अपने कुचालों से जनता को, अपने निर्वाचन क्षेत्रों को और अपने देश को कलंकित किया है।’
जनता और राजनीति (
हंस, अप्रैल 1933) के संपादकीय में प्रेमचंद लिखते हैं- ‘
आज जिस प्रकार दल बनते हैं, टिकट बंटते हैं और भाषणों में झूठ और उत्तेजना का बोलबाला होता है, उससे तो यही लगता है कि हम एक अशिक्षित समाज में लोकतंत्र की अधकचरी नकल कर रहे हैं।‘ यह टिप्पणी साफ़ दर्शाती है कि प्रेमचंद उस चुनावी राजनीति से निराश थे जिसमें धनबल, जाति और भावनात्मक प्रचार हावी हो चला था।
प्रतिनिधि कौन?
प्रतिनिधि कौन? (
हंस, नवंबर 1934) में वे लिखते हैं-
‘किसी का प्रतिनिधि बनने का अर्थ यह नहीं कि वह मतदाता से श्रेष्ठ है, बल्कि उसका सेवक है। दुर्भाग्य है कि हमारे प्रतिनिधि सत्ता का स्रोत बनना चाहते हैं, सेवा का नहीं।‘यहाँ प्रेमचंद जनप्रतिनिधि की अवधारणा को उलट देते हैं — वे उसे एक सेवक के रूप में देखते हैं, जबकि व्यवहार में वह स्वामी जैसा व्यवहार करता है।
प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी
मंत्र भारतीय गाँवों में होने वाले चुनावों की हकीकत को बेनकाब करती है। इस कहानी में दो उम्मीदवार पंडित उदयभानु और मोतीलाल पंचायत चुनाव में खड़े होते हैं। मोतीलाल चुनाव जीतने के लिए धार्मिक भावनाओं को भड़काता है, लोगों में भ्रम फैलाता है और जातिगत समीकरण साधता है। उदयभानु तांत्रिक विधियों से जनता को डराकर वोट हासिल करता है। यहाँ प्रेमचंद चुनाव को लोकशाही का उत्सव नहीं बल्कि एक धोखे और चालबाज़ी का मैदान बताते हैं। प्रत्याशी मुद्दों पर नहीं, भावनाओं पर चुनाव लड़ते हैं। जनता ठगी जाती है, फिर पाँच साल चुप रहती है। धर्म और जाति का दुरुपयोग होता है। प्रेमचंद की यह कहानी आज के ‘सांप्रदायिक ध्रुवीकरण’ और ‘फेक न्यूज़’ आधारित चुनाव अभियानों की गूंज जैसी लगती है।
कहानी
नशा में प्रेमचंद लिखते हैं-
‘वह जो कल तक खेत में हल चला रहा था, आज कुर्सी पर बैठकर पान चबा रहा है, यह कुर्सी आदमी को निगल जाती है।‘ प्रेमचंद एक किसान प्रतिनिधि को दिखाते हैं जो चुनाव जीतने के बाद सत्ता के नशे में इतना डूब जाता है कि उसे जनता की पीड़ा दिखाई ही नहीं देती। यह कहानी प्रतिनिधियों के उस चारित्रिक बदलाव को उजागर करती है जो चुनाव से पहले और बाद में दिखाई देता है। यह सत्ता का ‘नशा’ है, जो जनसेवा के मूल भाव को कुंद कर देता है।
प्रेमचंद की राजनीति नारे नहीं गढ़ती, क्रांति के वादे नहीं करती — वह यथार्थ के बीच से जन्म लेती है। वह प्रेमचंद के पात्रों के दुखों, संघर्षों, असहमतियों और प्रतिरोधों में बसती है। उनका लेखन राजनीति का नया व्याकरण रचता है। एक ऐसा व्याकरण जिसमें किसान की भाषा, स्त्री की पीड़ा, मज़दूर की थकान और दलित की चुप्पी शामिल है।
चुनाव की राजनीति
रंगभूमि प्रेमचंद का राजनीतिक उपन्यास है जो विकास, भूमि अधिग्रहण और जनहित बनाम निजी लाभ की बहस को केंद्र में रखता है। यहाँ सुजान भगत जैसे पात्र — जो अंधा है परन्तु नैतिक रूप से प्रखर — एक कारखाने के निर्माण का विरोध करता है जो उसकी जमीन पर बनना है। राजा महेंद्र सिंह, जो स्वयं को जनता का हितैषी बताता है, अपने निजी स्वार्थ के लिए चुनाव से पहले जनता को बहलाने की कोशिश करता है।
चुनाव की राजनीति की झलक यहाँ देखने को मिलती है। चुनाव के लिए झूठे वादे किये जाते हैं। जनता को लालच देकर समर्थन लिया जाता है। ज़मीन अधिग्रहण को ‘राष्ट्रीय हित’ के नाम पर जायज़ ठहराया जाता है। यहाँ चुनाव की प्रक्रिया तो कहीं स्पष्ट नहीं, पर सत्ता में पहुँचने की चालबाज़ियों से प्रेमचंद एक गहरी राजनीतिक चेतावनी देते हैं। वे कहते हैं कि जब तक जनता को यह नहीं पता कि वह क्यों वोट दे रही है, किसे दे रही है, और उससे क्या उम्मीद की जानी चाहिए, तब तक चुनाव केवल एक भ्रम है। इस विचार की प्रासंगिकता आज भी है, जब करोड़ों लोग जाति, धर्म और प्रलोभन के आधार पर मतदान करते हैं।
गोदान में प्रेमचंद ने चुनाव को सीधे चित्रित नहीं किया, लेकिन राजनीति और सत्ता की प्रकृति को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत किया है। मालती और मेहता जैसे पात्रों के माध्यम से यह दिखाया गया है कि कैसे सामाजिक सेवा की आड़ में सत्ता के समीकरण गढ़े जाते हैं। पंडित मातादीन जैसे पात्र धर्म और जाति के नाम पर सामाजिक ध्रुवीकरण करते हैं। यह सब चुनावी राजनीति के लिए सामाजिक आधार तैयार करते हैं। प्रेमचंद इस पूरे ‘राजनीतिक नाटक’ को बिना चुनाव कहे ही निर्वाचित सत्ता की संरचना को बेनकाब कर देते हैं।
प्रेमचंद के साहित्य और लेखन में चुनाव केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक नैतिक चुनौती है। वे बार-बार पूछते हैं कि क्या हमारा मतदाता स्वतंत्र है? क्या प्रत्याशी वास्तव में जनप्रतिनिधि हैं या स्वार्थी दलाल? क्या चुनाव व्यवस्था समानता और न्याय सुनिश्चित कर रही है? उनका निष्कर्ष यही है कि जब तक सामाजिक न्याय, शिक्षा और जागरूकता नहीं होगी, तब तक चुनाव जनता का उत्सव नहीं बल्कि शोषण का आयोजन बना रहेगा।
प्रेमचंद जन प्रतिनिधि को ‘लोक सेवक’ के रूप में परिकल्पित करते हैं-जो जनता के दुख-दर्द को समझे, जो सत्ता का नहीं, जनता का उपासक हो और जो शिक्षित और नैतिक हो। वे मानते थे कि चुनावी प्रतिस्पर्धा में नैतिकता, आदर्श और जनकल्याण की जगह स्वार्थ, धनबल, धोखाधड़ी और चालबाजी ने ले ली है। उनकी नजर में राजनीति का अंतिम लक्ष्य आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मुक्ति था।