छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम के परिप्रेक्ष्य में आदिवासी महिलाओं के संपत्ति अधिकार और कानून 

सुनील उरांव



I. प्रस्तावना

आदिवासी महिलाओं,  विशेष रूप से विवाहित महिलाओं . के कृषि भूमि पर उत्तराधिकार संबंधी अधिकार लंबे समय से रूढ़िगत मान्यताओं और पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण के कारण विवादित रहे हैं। छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908, जो झारखंड में आदिवासी भूमि की रक्षा के लिए एक प्रमुख विधिक साधन है, में "भूमि जोतने वाला" (tiller of the soil) सिद्धांत का अक्सर ऐसा अर्थ निकाला गया है जिससे विवाहित बेटियों को उनके पैतृक कृषि भूमि में अधिकार से वंचित किया गया। यह व्याख्या अक्सर इस धारणा पर आधारित थी कि विवाह के बाद एक महिला अपने पैतृक परिवार का हिस्सा नहीं रहती और इसलिए उसके पैतृक भूमि पर कोई अधिकार नहीं होता, खासकर यदि वह स्वयं खेती न करे।

हालांकि, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में दिए गए निर्णय रामचरण एवं अन्य बनाम सुखराम एवं अन्य, सिविल अपील संख्या 9537/2025 में यह स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत खेती का अभाव या विवाह के बाद स्थानांतरण किसी आदिवासी महिला को उसके वैध उत्तराधिकार से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता। यह निर्णय आदिवासी महिलाओं के संपत्ति अधिकारों के संबंध में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जो संवैधानिक समानता के सिद्धांतों को प्रथागत कानूनों पर प्राथमिकता देता है।
यह कानूनी टिप्पणी छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम के उत्तराधिकार और भूमि अंतरण प्रावधानों के साथ-साथ संवैधानिक समानता और लैंगिक न्याय से संबंधित न्यायशास्त्र के बीच के अंतर्संबंध का विस्तृत विश्लेषण करती है, और सर्वोच्च न्यायालय के नवीनतम निर्णय के निहितार्थों पर प्रकाश डालती है।

II. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम: खेती, उत्तराधिकार और अंतरण का विधिक ढाँचा

छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 का प्राथमिक उद्देश्य आदिवासी भूमि के गैर-आदिवासियों को अवैध अंतरण को रोकना और पारंपरिक काश्तकारी अधिकारों की रक्षा करना है। यह अधिनियम आदिवासी समुदायों के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को बनाए रखने में महत्वपूर्ण है। इसके प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं, जिनका विवाहित आदिवासी महिलाओं के संपत्ति अधिकारों पर सीधा प्रभाव पड़ता है:
  • धारा 6 (1) : व्यक्तिगत खेती और भौतिक कब्जा - यह धारा रैयत की आवश्यक विशेषताओं को परिभाषित करती है, जिसमें व्यक्तिगत खेती और भौतिक कब्जा शामिल है। पारंपरिक रूप से, इस धारा की व्याख्या अक्सर इस तरह से की गई है कि यदि कोई महिला स्वयं भूमि पर खेती नहीं करती है (विशेषकर विवाह के बाद), तो उसे "भूमि जोतने वाला" नहीं माना जाएगा और इस आधार पर उसके उत्तराधिकार के अधिकार को चुनौती दी जा सकती है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने इस संकीर्ण व्याख्या को चुनौती दी है, यह स्पष्ट करते हुए कि खेती केवल कब्जे का संकेत हो सकती है, न कि स्वामित्व या उत्तराधिकार के अधिकार का निर्धारण। एक महिला अपने पति, बच्चों या किसी अधिकृत व्यक्ति के माध्यम से भी भूमि पर कब्जा बनाए रख सकती है।
  • ·धारा 17: अधिभोग अधिकार का उत्तराधिकार - यह धारा स्पष्ट रूप से बताती है कि अधिभोग अधिकार (occupancy rights) उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित और उत्तराधिकार योग्य होते हैं। अधिनियम पुरुष और महिला उत्तराधिकारियों के बीच कोई भेद नहीं करता है, न ही विवाहित बेटियों को उत्तराधिकार से वंचित करने का कोई प्रावधान करता है। इसका तात्पर्य यह है कि यदि कोई प्रथागत/रूढ़िगत कानून विवाहित बेटियों को उत्तराधिकार से वंचित करता है, तो उसे संवैधानिक वैधता के लिए संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 15 (धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध) के तहत परखा जाना चाहिए। संवैधानिक सिद्धांतों के आलोक में, ऐसी कोई भी रूढ़ि या प्रथा जो लिंग के आधार पर भेदभाव करती है, असंवैधानिक मानी जाएगी।
  • ·धारा 46: अंतरण का नियमन - यह धारा स्वैच्छिक अंतरणों जैसे विक्रय, पट्टा (lease) या उपहार/दान (gift) पर नियंत्रण लगाती है, जिसके लिए उपायुक्त की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होती है। इस धारा का उद्देश्य आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों के हाथों में जाने से रोकना है। हालांकि, मोसमात किशुनी कुवंर बनाम अंडू महतो (AIR 1930 Pat 55) जैसे ऐतिहासिक मामलों में पटना उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि उत्तराधिकार और वसीयत (will) के माध्यम से संपत्ति का अंतरण इस धारा के अधीन नहीं आता है। इसका मतलब है कि उत्तराधिकार के माध्यम से प्राप्त भूमि के लिए उपायुक्त की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती, जिससे आदिवासी महिलाओं के लिए विरासत में मिली भूमि पर अधिकार का दावा करना आसान हो जाता है।
  • ·धारा 23A: अंतरणों का पंजीकरण - यह धारा विधिक रूप से हुए अधिभोग अंतरणों के पंजीकरण का प्रावधान करती है, चाहे वह उत्तराधिकार, वसीयत या किसी अन्य विधिक आधार पर हो। यह धारा आदिवासी महिलाओं को प्राप्त भूमि का नामांतरण (mutation) कराने का अधिकार देती है, चाहे वे स्वयं खेती करें या नहीं, या उनका निवास स्थान कहीं भी हो। यह स्पष्ट करता है कि पंजीकरण केवल एक प्रक्रियात्मक आवश्यकता है, न कि स्वामित्व या उत्तराधिकार के अधिकार का निर्धारण। यदि कोई महिला वैध उत्तराधिकारी है, तो राजस्व अधिकारियों को उसका नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज करना अनिवार्य है।

III. रामचरण बनाम सुखराम (2025) में सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय

यह मामला आदिवासी महिलाओं के संपत्ति अधिकारों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। इस मामले में, एक आदिवासी महिला, धईया, के उत्तराधिकारी ने उसके पिता की पैतृक भूमि में हिस्सेदारी की मांग की थी। ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने उनके दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि:
  • बेटी को उत्तराधिकारी मानने वाली कोई प्रथागत परंपरा सिद्ध नहीं हुई।
  • महिला द्वारा व्यक्तिगत खेती का कोई प्रमाण नहीं दिया गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने इन निर्णयों को पलटते हुए एक प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाया और निम्नलिखित महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किए:
  • प्रथागत कानून की सीमाएँ:- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब तक कोई प्रथागत/रूढ़िगत परंपरा प्रमाणित न हो और वह संवैधानिक रूप से वैध न हो, तब तक किसी महिला को उत्तराधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यह प्रथागत कानूनों की मनमानी व्याख्या पर एक महत्वपूर्ण रोक लगाता है।
  • छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम की व्याख्या:- सर्वोच्च न्यायालय ने पुष्टि की कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम स्वयं विवाहित महिलाओं को उत्तराधिकार से वंचित नहीं करता है। अधिनियम की भाषा लिंग-तटस्थ है और इसलिए इसे इस तरह से व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है जो महिलाओं के अधिकारों को सीमित करे।
  •  न्याय, नीति और सद्विवेक के सिद्धांत:- न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जहां कोई विशिष्ट कानून या प्रथा स्पष्ट नहीं हो, वहां सेंट्रल प्रोविंसेज लॉज एक्ट, 1875,  के तहत "न्याय, नीति और सद्विवेक के सिद्धांत" लागू होते हैं। इन सिद्धांतों का उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाना चाहिए कि न्यायिक निर्णय समानता और न्याय के अनुरूप हों।
  • संवैधानिक समानता का उल्लंघन:- सबसे महत्वपूर्ण रूप से, न्यायालय ने कहा कि लिंग या वैवाहिक स्थिति के आधार पर किसी महिला को संपत्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का सीधा उल्लंघन है। ये अनुच्छेद समानता और गैर-भेदभाव के मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करते हैं, और कोई भी प्रथागत/रूढ़िगत कानून जो इन अधिकारों का उल्लंघन करता है, असंवैधानिक होगा।
यह निर्णय इस बात पर भी जोर देता है कि अदालतों को प्रथागत कानूनों की व्याख्या करते समय संवैधानिक मूल्यों के प्रति सचेत रहना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे समय के साथ विकसित हों और अन्याय को बढ़ावा न दें।

IV. विवाहित आदिवासी महिलाओं की वर्तमान वैधानिक स्थिति

रामचरण बनाम सुखराम (2025) के निर्णय के बाद, विवाहित (या अविवाहित) आदिवासी महिलाओं की वैधानिक स्थिति काफी मजबूत हुई है। विवाह अब किसी आदिवासी महिला को अधिभोग अधिकारों या उत्तराधिकार से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता है:
  • वह धारा 17 के अंतर्गत अपने पिता की संपत्ति की एक विधिक उत्तराधिकारी बनी रहती है, भले ही वह विवाहित या अविवाहित हो।
  • · वह धारा 23A के अंतर्गत अपनी विरासत में मिली भूमि का पंजीकरण कराने की पात्र है, चाहे उसका निवास कहीं भी हो या वह स्वयं खेती न करती हो।
  • ·उसकी भूमि पर कब्जा उसके पति, बच्चों या किसी अन्य अधिकृत व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है, और यह उसके स्वामित्व के अधिकार को प्रभावित नहीं करेगा।
  • ·राजस्व अधिकारी (जैसे अंचल अधिकारी या उपायुक्त) उसकी अयोग्यता की कोई न्यायिक घोषणा न होने पर उसका नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने के लिए बाध्य हैं। उन्हें लिंग या वैवाहिक स्थिति के आधार पर नामांतरण आवेदनों को अस्वीकार करने का अधिकार नहीं है।

V. प्रशासनिक प्रभाव और कर्तव्य

2025 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के आलोक में, प्रशासनिक अधिकारियों के लिए निम्नलिखित महत्वपूर्ण दायित्व और दिशानिर्देश बनते हैं:
  • नामांतरण और पंजीकरण में समानता:- राजस्व अधिकारी (अंचल अधिकारी, उपायुक्त) विवाहित आदिवासी महिलाओं के नामांतरण या पंजीकरण के आवेदन को केवल विवाह या व्यक्तिगत खेती न करने के आधार पर अस्वीकार नहीं कर सकते। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि नामांतरण प्रक्रिया में लिंग-आधारित भेदभाव न हो।
  • वैध उत्तराधिकार प्रमाणों का आधार:- धारा 23A के तहत पंजीकरण वैध उत्तराधिकार प्रमाणों के आधार पर किया जाना चाहिए। अधिकारियों को उन प्रथागत/रूढ़िगत दावों को अस्वीकार करना चाहिए जो संवैधानिक समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं।
  • खेती और कब्जे का अंतर:-अधिकारियों को यह समझना होगा कि खेती स्वामित्व का नहीं बल्कि केवल कब्जे का संकेत हो सकती है। एक महिला का संपत्ति पर अधिकार उसकी व्यक्तिगत खेती पर निर्भर नहीं करता।
  • राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज करना:- बेटियों का नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया जाना चाहिए जब तक कि किसी सक्षम न्यायालय द्वारा उनकी अयोग्यता सिद्ध न हो जाए। यह सुनिश्चित करना अधिकारियों का कर्तव्य है कि राजस्व रिकॉर्ड अद्यतन हों और महिलाओं के अधिकारों को दर्शाते हों।
  • ·जागरूकता और संवेदनशीलता:- प्रशासनिक अधिकारियों को आदिवासी महिलाओं के संपत्ति अधिकारों से संबंधित कानूनी प्रावधानों और न्यायिक निर्णयों के प्रति संवेदनशील और जागरूक होना चाहिए। उन्हें महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में सूचित करने और उन्हें कानूनी सहायता प्रदान करने में भी भूमिका निभानी चाहिए।

VI. निष्कर्ष

छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908, जब संवैधानिक अधिकारों और न्यायिक व्याख्याओं के साथ पढ़ा जाए, तो यह स्पष्ट करता है कि आदिवासी महिलाओं के भूमि अधिकार समान, उत्तराधिकार योग्य और लागू करने योग्य हैं। अधिभोग अधिकार वैवाहिक स्थिति या व्यक्तिगत खेती पर निर्भर नहीं करते। यह कानूनी ढाँचा आदिवासी महिलाओं को उनकी पैतृक भूमि पर समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान करता है।

सर्वोच्च न्यायालय का 2025 का निर्णय रामचरण बनाम सुखराम पुराने पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण को समाप्त कर, आदिवासी महिलाओं के भूमि उत्तराधिकार अधिकारों को प्रगतिशील दिशा प्रदान करता है। यह निर्णय न केवल आदिवासी महिलाओं को सशक्त बनाता है, बल्कि भारतीय न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है कि वह संवैधानिक मूल्यों को प्रथागत कानूनों पर प्राथमिकता देगी, खासकर जब वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हों। यह आवश्यक है कि प्रशासनिक और न्यायिक प्राधिकरण इन विधिक मानकों का पालन सुनिश्चित करें जिससे लैंगिक न्याय, आदिवासी गरिमा और काश्तकारी कानून की अखंडता सुरक्षित रह सके। इस निर्णय का व्यापक प्रभाव होगा और यह भविष्य में आदिवासी महिलाओं के संपत्ति अधिकारों से संबंधित मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करेगा।

(लेखक, अधिवक्ता हैं)
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