दिल्ली के विधानसभा में दो दिवसीय अखिल भारतीय स्पीकर सम्मेलन रविवार से शुरू हुआ। झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रबीन्द्रनाथ महतो ने इस सम्मेलन में भाग लिया। सम्मेलन वीर विट्ठलभाई पटेल के केंद्रीय विधानसभा अध्यक्ष बनने के 100 साल पूरे होने पर हो रहा है। इसमें विभिन्न राज्यों के विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष भाग ले रहे हैं। स्पीकर रबींद्रनाथ ने सम्मेलन में भाग लेते हुए भारतीय संविधान और विधायी संस्थाओं के आकार लेने में स्वतंत्रता सेनानी वीर विट्ठल भाई पटेल की योगदान के संबंध में अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। इस अवसर पर विट्ठलभाई पटेल के जीवन पर एक प्रदर्शनी भी लगाई है।
झारखंड में पूरक मॉनसून सत्र के कारण स्पीकर रबीन्द्रनाथ महतो सम्मेलन समाप्त होने के पूर्व ही अपने व्याख्यान समाप्त कर रविवार को संध्या यात्री सेवा विमान से रांची लौट आये। उन्होंने सम्मेलन में दिये गये अपने व्याख्यान में कहा कि भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा, सभ्यता के प्रारंभ से ही हमारे सामाजिक ताने-बाने का अंग रही है। भारतीय समाज व्यवस्था में अर्न्तनिहित स्वाभाविक लचीलेपन का समावेश इसमें भी रहा है। जिस कारण लोकतांत्रिक परंपराओं में समय-समय पर हुए महत्वपूर्ण नवाचारों को इसने स्वयं में बड़े स्वाभाविक रूप से समाहित कर लिया है।
भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा की यह भव्यता को पूर्ण रूप से अगर कोई व्यक्तित्व परिभाषित करता है तो वह है विट्ठल भाई पटेल जी का। 27 सितम्बर 1873 को गुजरात में जन्में विटठ्ल भाई पटेल ने वकालत से अपने व्यवसायिक जीवन का प्रारंभ किया परन्तु बाद में एक प्रखर राजनेता महान स्वतंत्रता सेनानी एवं तब के सर्वोच्च विधायी संस्था के अध्यक्ष के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 01 जुलाई 1908 को बार के सदस्य बने। 1912 में हुए बम्बई प्रेसीडेंसी लेजिसलेटिव कौंसिल के सदस्य निर्वाचित हुए। वर्ष 1924 में वे बम्बई से केन्द्रीय विधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए और उसके बाद स्वराज पार्टी के उपनेता बने। 22 अगस्त 1925 को उन्हें केन्द्रीय विधान सभा का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। उन्हें बड़े ही कड़े संघर्ष के बाद केन्द्रीय विधान सभा का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। वे इस पद को सुशोभित करने वाले पहले भारतीय थे।
पटेल के नाम एक और महत्वपूर्ण संसदीय परम्परा जुड़ी है वह परम्परा है राष्टÑपति एवं राज्यपाल के अभिभाषण के समय अध्यक्षीय पीठ का राष्टÑपति अथवा राज्यपाल के समीप स्थापित रखा जाना। इस परम्परा की शुरूआत पटेल ने ही की थी जब गर्वनर जनरल के सदन में अभिभाषण के दौरान उन्होंने अध्यक्षीय पीठ से उतरकर सभा के अन्य सदस्यों के बीच बैठना अस्वीकार कर दिया। यह परम्परा आज भी हमारे संसद एवं विधान सभाओं में स्थापित हैं।
अध्यक्षीय पीठ के गरिमा को अक्षुण्ण रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा था कि अध्यक्ष किसी दल का नहीं होता। वह पूरे सदन का संरक्षक होता है। उसका धर्म है कि सभी पक्षों को समान अवर मिले। इसका उन्होंने अक्षरश: पालन किया। उनका इस बात में दृढ़ विश्वास था कि पक्ष-विपक्ष के वाद-विवाद के माध्यम से ही राष्टÑ के संचालन की सही राह निर्धारित हो पाएगी। इस कारण सदन में पक्ष और विपक्ष की निर्भीक आवाज सुनाई देनी चाहिए। सदन के सदस्यों को सीमा रहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए ताकि वे अपने विचार बिना किसी भय और अंकुश के रख सकें। उनका कहना था कि संसद की शक्ति उउसके परस्पर और अनुशासन में है। यदि नियमों का पालन न हो, तो यह केवल बहस का मंच रह जाएगा, परंतु एक लोकतांत्रिक संस्था नहीं। 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के साथ विट्ठल भाई का वह सपना पूरा हो गया। संसद और विधान मण्डल जैसी संवैधानिक संस्थाएं विट्ठल भाई जैसे अग्रदूतों के सपनों को साकार करती हैं।